25 जनवरी 2013

चलो देखें नई नई सुबह


चलो देखें नई नई
सुबह को गजर कहता है क्या
हवा बहेगी कैसी अब
अमन को असर होता है क्या

स्वर्णिम छटा फैलाएगी
पहली किरण सूरज की तब
अँगड़ाइयाँ लेंगे विहग
स्वच्छंद हो उड़ेंगे तब
आलोक से भागेगा तम
गगन को असर होत्ता है क्या

नर्म नाजु़क सुबह की
दस्तक सुनो सोने वालो
घंटियाँ-अज़ानों में
फ़रक सुनो सोने वालो
हवा-धूप की ज़िरह से
वतन को असर होता है क्या

दुपहर की धूप गुनगुनी
सुबह है सर्द मखमली
फि‍सलती शाम रेशमी
तपन है घर में मलमली
दहशत में बाग़ अब तलक
चमन को असर होता है क्या

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक रचना और सार्थक चित्र. बधाई.
    -डा. रघुनाथ मिश्र्

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