30 सितंबर 2015

कहते हैं (ग़ज़ल)

कहते हैं झूठ मीठा और सच कड़वा होता है।
कहते हैं बगावतों से अकसर बलवा होता है।
चुप रहना दिन ब दिन समस्‍यायें बढ़ाता है कई,
कहते हैं सच पर जारी अक़सर फ़तवा होता है।
झूठ से इंसाँ हमेशा रहता है डरा-डरा सा,
कहते हैं सच बेख़ौफ़ और बेपरवा होता है।
ऐसा भी नहीं है सच ने सदा ही खुशियाँ दी हों,
कहते हैं ज़ि‍न्‍दगी दे झूठ तब वह दवा होता है।
झूठ की तरह सच याद नहीं रखना पड़ता कभी,
कहते हैं यही सच्‍चाई का जलवा होता है।
झूठ जेठ की दुपहरी, सच सावन की फुहारें हैं,
कहते हैं सच बहार, झूठ ख़़ि‍ज़ाँ का बिरवा होता है।
झूठ के पाँव नहीं होते, हवा में उड़ता 'आकुल',
कहते हैं सच्‍चाई से सदा डर हवा होता है।

28 सितंबर 2015

मैं कौनसा गीत सुनाऊँ----लताजी 86वर्ष की हुईं।

लता मंगेशकर
लता मंगेशकर 
आज स्‍वर साम्राज्ञी भारत रत्‍न लताजी का 87वाँ (28 सितम्‍बर 1929) जन्‍मदिन है। उनके बारे में सबने अपने अपने तरीके से लिखा है।
उनकी महिमा का बखान सूरज को रोशनी दिखाने के समान है। बस यूँ ही उनके बारे में कभी कुछ सोच लें, उनसे प्रेरणा लें और उनका अनुकरण, अनुसरण करें, पथ कोई सा भी हो संगीत हो, साहित्‍य हो, व्‍यवसाय हो, बस कुछ कर गुजरने की इ्च्‍छाशक्ति हो।आज लता जी को मिले पुरस्‍कार सम्‍मान शायद छोटे पड़ जाते हैं, इन सम्‍मानों का सम्‍मान होता है लताजी से जुड़ कर। उनके गाये अमर गीतों से हम हमेशा उन्‍हें याद करते हैं और करते रहेंगे। लताजी वो शख्सियत हैं जिनके 50 हजार से अधिक गाये गीत गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं।इसके अलावा लता मंगेशकर को वर्ष में पद्मभूषण, वर्ष 1989 में दादा साहब फाल्‍के सम्‍मान, वर्ष 1999 में पद्म विभूषण और वर्ष 2001 में भारत रत्‍न जैसे कई सम्‍मान प्राप्‍त हो चुके हैं। 
राजनीति हर जगह हावी रहती है। कुछ घटनायें हैं जिन्‍हें याद कर वे आज भी रोमांति हो जाती हैं। जैसे उन्‍हें धीमा ज़हर दे कर मारने की कोशिश की गई, लेकिन वे बच गयीं। उन्‍होंने संगीतकार नौशाद को कभी ऑडिशन नहीं दिया, वो बात अलग है कि उन्‍होनं चतुराई से उर्दू शब्‍दों के तलफ़्फु़ज को बयाँ करने के अंदाज़ को देखना चाहते थे और वे मना नहीं कर सकीं, ओ- पी- नैयर के निर्देशन में उन्‍होंने नहीं गाया। कई बातें उनकी बहुत सम्‍मान की जाती हैं, वे स्‍टूडियों में कभी चप्‍पल पहन कर नहीं गयीं। दूसरी गायिकाओं का मौका नहीं देने के भी उन पर आरोप लगे, पर वे सबसे बे‍फि‍क्र हो कर अपनी यात्रा करती रहीं। अपनी सरस्‍वती की साधना में लगी रहीं। पूरी तरह से स्‍थापित हो जाने के बाद कभी वे काम माँगने नहीं गईं। लंबे समय तक  समय तक स्‍टेज शो आदि नहीं दिया करती थीं, किन्‍तु बाद में सभी के आग्रहों पर कई यादगार कंसर्ट उन्‍होंने किये और विदेशों में भी अपना परचम फहराया। उनके गाये दूसरे कलाकारों गायकों के गाये ये गीत 'ओ मेरे दिल के चैन' और 'कहीं दूर जब दिन ढल जाये' सदाबहार हैं। मस्‍तोमौला और खिलंदड़ स्‍वभाव के किशोर कुमार तो लताजी के सामने या लता जी के साथ स्‍टूडियो में अनुशासन से गाते थे। मुकेशजी को तो वे भाई मान कर राखी बाँधती थीं।आज उनके सम्‍मान में मैं एक गीत, जो बहुत कम एफएम, रेडियो अथवा टीवी पर दिखाई सुनाई पड़ता है, आशा है आप भी पसन्‍द करेंगे। वह गीत है 'मैं कौनसा गीत सुनाऊँ, क्‍या गाऊँ जो पिया बस जाये, मेरे तन मन में' बासु चटर्जी की फि‍ल्‍म 'दिल्‍लगी' का, जिसमें संगीतकार राजेश रोशन ने बहुत ही बेहद उम्‍दा संगीत दिया है, गीत योगेश ने लिखा है, और फि‍ल्‍म में यह धर्मेन्‍द्र, हेमा, असरानी आदि कुछ कलाकारों के बी नदी के किनारे फि‍ल्‍माया गया हे। सुना है उनके लिए प्रख्‍यात शास्‍त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खाँ साहब ने उनके बारे में किसी महफि‍ल में किसी से बडृे प्‍यार से कहा था 'कमबख्‍़त बेसुरी नहीं होती।' उनकी सुरीली आवाज तो ठीक उनकी आवाज का जादू था कि बात करते समय भी इतनी मीठी सुनाई देती है, जैसे मिश्री घोल दी हो। श्रीमती इन्दिरागाँधी तो उनसे बात करते करते उनको देखती ही रहतीं और उनकी आवाज़ में खो जाती थीं। लीजिए उनके साथ का एक अविस्‍मरणीय फोटो लताजी का एवं स्‍व0 राजकपूर एवं बॉलिवुड की टीम का यहाँ संलग्‍न है। 
बायें से कुछ चर्चित कलाकार- (खड़े हुए ) अनिल धवन, धर्मेन्‍द्र, विनोदखन्‍ना, फि‍रोजख़ान, शर्मिला टैगोर, सायराबानो, राजेंद्र कुमार, लता मंगेशकर, संगीतकार कल्‍याणजी, बी0आर0चौपड़ा, रामानन्‍द सागर।  (कुर्सी पर) श्रीमती इन्दिरागाँधी । (जमीन पर बैठे हुए)- नौशाद, दिलीप कुमार, राजकपूर, मनोज कुमार, संगीतकार आनन्‍दजी आदि

O Mere Dil Kay Chain (Lata Mangeshkar)

26 सितंबर 2015

गणेशाष्‍टक से गणेश आराधना

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।
सिद्धि विनायक, शिव गौरी सुत, जय गणेश।।

धरा सदृश्‍ा माँ है, माता की परिकम्‍मा कर आए।
एकदन्‍त गणनायक गणपति प्रथम पूज्‍य कहलाए।।
प्रथम पूज्‍य कहलाए गणपति जय गणेश।
गाएँ सब लम्‍बोदर गणपति, जय गणेश।।1।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश ।।

लाभ क्षेम दो पुत्र, ॠद्धि सिद्धि के स्‍वामि गजानन।
अभय और वर मुद्रा में करते कल्‍याण गजानन।।
करते कल्‍याण गजानन, गणपति जय गणेश।
भावभक्ति से पूजें गणपति, जय गणेश।।2।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जयगणेश।।

मानव देव असुर सब पूजें, त्रिदेवों ने गुणगाए।
धर त्रिपुण्‍ड मस्‍तक पर शशिधर भालचन्‍द्र कहलाए।।
भालचन्‍द्र कहलाए गणपति, जय गणेश।
सिन्‍दूर धराओ सब मिल गण्‍पति जय गणेश।।3।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।

असुर नाग नर देव स्‍थापक चतुर्वेद के ज्ञाता।
जन्‍म चतुर्थी, धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष के दाता।
काम-मोक्ष के दाता, गणपति, जय गणेश।
विघ्‍न विनाशक, तारक गणपति, जय गणेश।।4।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।

पंचदेव और पंचमहाभूतों में प्रमुख कहाये।
बिना रुके लिख महाभारत महाआशुलिपिक कहलाए।
आशुलिपिक कहलाए गणपति, जय गणेश।
शास्‍त्री, बु‍द्धि प्रदाता, गणपति, जय गणेश।।5।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।

अंकुश, पाश, गदा, खड़्ग लड्डू चक्र षड्भु धारे।
मोदक प्रिय मूषक वाहन प्रिय शैलसुता के प्‍यारे।
शैलसुता के प्‍यारे गणपति, जय गणेश।
भ्रात कार्तिकेय हैं जय गणपति, जय गणेश।।6।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।

सप्‍ताक्षर 'गणपतये नम:' सप्‍तचक्र मूलाधारी।
विद्या वारिधि वाचस्‍पति, महामहोपाध्‍याय अनुसारी।
सप्‍ताक्षर 'गणपतये नम:' जय गणेश।
गणनाथ नमो नमस्‍ते, गणपति जय गणेश।।7।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।

छन्‍दशास्‍त्र के अष्‍टगणाधिष्‍ठाता अष्‍टविनायक।
आकुल जय गणेश जय गणपति सबके कष्‍टनिवारक।
सबके कष्‍टनिवारक गणपति, जय गणेश।
शोक विनाशकारकम् गणपति, जय गणेश।।8।।

जय गणेश, जय गणेश, गणपति, जय गणेश।।


22 सितंबर 2015

हिन्‍दी सबको प्‍यारी होगी

हिन्‍दी सबको प्‍यारी होगीं ।
इसकी छवि उजियारी होगी।।

ना कोई लाचारी होगी ।
अब ना ये बेचारी होगी।
ना कोई रँगदारी होगी।
मर्दुम रायशुमरी होगी।

खड़ी फौज सरकारी होगी।
भाषा अब दरबारी होगीं ।
अंग्रेजी पर भारी होगी।
फि‍र भी यह हितकारी होगी।

जब तक ना खुददारी होगी।
जब तक ना तैयारी होगी।
हिन्‍दी से ना यारी होगी।
आर पार की पारी होगी।

संसद में किलकारी होगी।
प्रतिनिधियों की बारी होगी।
तब ही जीत हमारी होगी।
जीत हमारी न्‍यारी होगी।

कुलकिरीट मणिधारी होगी।
हिन्‍दी की बलिहारी होगी।
राजपत्र में जारी होगी।
तब होरी दीवारी होगी।

हिन्‍दी सबको प्‍यारी होगीं ।
इसकी छवि उजियारी होगी।।

21 सितंबर 2015

नवगीत गुलदस्‍ता है


कविता कली, गीत गुल
नवगीत गुलदस्‍ता है।

कवियों ने इसे कई
नए आयाम दिये हैं
मुक्‍तछन्‍द की रौ में 
बहते पयाम दिये हैं

साहित्‍य संगीत से
इसमें रस मधुरता है। 


छन्‍दानुशासन प्रकृति
लोकगीत लुभावन है
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
प्रयोग भी रिझावन है

 लोक संस्‍कार इसमें
झलकती समरसता है।


मूलभाव रचना का
हो सदैव प्रतीकात्‍मक
सम्‍भव हो सके बने
वह सदैव सकारात्‍मक

गूँजता है नवगीत
जहाँ जीवन बसता है।

कविताओं गीतों ने
इसमें रवानी भर दी
फ़ज़ा ने प्राण फूँके
इसमें जवानी भर दी

हवा गुनगुनाती है
तब नवगीत बनता है।

14 सितंबर 2015

हिन्‍दी पूरब की थाती है

हिन्‍दी पूरब की थाती है।
चहूँ दिशा जानी जाती है।।

इसका विस्‍तृत है शब्‍दकोष
स्‍वर व्‍यंजन से है ज्ञानकोष
लिखते वैसा जैसा बोलें,
जिससे मिटते  हैं वाक्दोष।

है वैज्ञानिक आधारित यह।
संस्‍कृति इसके गुण गाती है।
हिन्‍दी पूरब की थाती है।।

सरल सुपाठ्य इसकी अभिव्‍यक्ति
है अदम्‍य साहस और शक्ति
इसका चुम्‍बकीय आकर्षण,
भावविभोर हो जाता व्‍यक्ति।

प्रादुर्भाव देव भाषा से,
देवनागरी कहलाती है।
हिन्‍दी पूरब की थाती है।।

कर्ता, कर्म, विशेषण, कारक,
संज्ञा, सर्वनाम संवाहक
क्रिया, वचन, स्‍वर, व्‍यंजन सारे,
सरल व्‍याकरण है परिचायक

वर्णमाल इसकी सुनियोजित,
लिखते पढ़ते आ जाती है।
हिन्‍दी पूरब की थाती है।।

आज चुनौती बनी हुई है
अंग्रेजी से ठनी हुई है
जालघरों से जुड़ी हई यह,
विश्‍वजनों संग खड़ी हुई है।

यह कवि मनीषियों की भाषा,
अतुलित ऊर्जा भर जाती है।
हिन्‍दी पूरब की थाती है।।

थाती- धरोहर

9 सितंबर 2015

हिन्‍दी बने विश्‍व की भाषा

हिन्‍दी बने विश्‍व की भाषा 
स्‍वाभिमान की है परिभाषा।
गंगा जमनी जहाँ सभ्‍यता,
पल कर बड़ी हुई है भाषा।
संस्‍कृति जहाँ वसुधैवकुटुम्‍बकम्,
हिन्‍दी संस्‍कृत कुल की भाषा।
बाहर के देशों में रहते,
हर हिन्‍दुस्‍तानी की भाषा।
हर प्रदेश हर भाषा भाषी,
हिन्‍दी हो उन सबकी भाषा।
आज राजभाषा है अपनी,
कल हो राष्‍ट्रकुलों की भाषा।
बने राष्‍ट्रभाषा यह 'आकुल',
बस यह है मन की अभिलाषा।

1 सितंबर 2015

हिन्‍दी ज़िन्‍दाबाद

ई पत्रिका अनुभूति (www.anubhuti-hindi.org) के 1 सितम्‍बर, 2015 के हिन्‍दी दिवस विशेषांक में पढ़ें मेरी रचना-  हिन्‍दी ज़िन्‍दाबाद

31 अगस्त 2015

हिन्दी का दर्द

हम कोशिश में हैं कि
हिन्‍दी बने राष्‍ट्रभाषा
पर ऊँचे ओहदों पर बैठे
अपनी पीढ़ी को लेकिन
पढ़ा रहे अंग्रेजी भाषा
आरक्षण के लिए एक हैं
लोग, समाज सब इकजुट
नहीं किसी को पड़ी राष्‍ट्र की
उसकी क्‍या है अभिलाषा
सभी राज्‍य अपनी भाषा को
अनुसूची में चाहते देखना
नहीं किसी को पड़ी राष्‍ट्र की 
अपनी हिन्‍दी बने राष्‍ट्रभाषा
गॉंधी के घर में ही गाँधीवाद
धराशायी होता हम देख रहे हैं
क्‍यों फि‍र स्‍वप्‍न राष्‍ट्रभाषा का
हम देख रहे हैं? 
शिक्षा दिवस, हिन्‍दी दिवस
मनाकर क्‍यों हम अपनी
संचित ऊर्जा को
व्‍यर्थ फैंक रहे हैं
अंग्रेज चले गये, लेकिन
अंग्रेजी छोड़ गये
संस्‍कार का अपना
चोला छोड़ गये
भारत में काले अंग्रेजों का 
जब तक न होगा बहिष्‍कार
गाँधी के देश में अंग्रेजी का
जब तक न होगा संहार
नहीं आएगा रामराज्‍य !!!
और न बन पायेगी
अपनी हिन्‍दी राष्‍ट्रभाषा
यही दर्द लिये हिन्‍दी
जीती रहेगी, क्‍योंकि
हमने अपनाई है
गाँ--धी--वा--दी--धारा !!!
अहिंसा की विचारधारा !!!

14 अगस्त 2015

तिरंगा


तिरंगा, अपने देश की आन, बान और शान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
इसका वन्‍दन करते हैं हम सब भारतवासी, 
यह आज़ादी का परचम गणतन्‍त्र निशान है।
तिरंगा----------
सभी धर्म क्‍या मन्दिर, मस्जिद क्‍या गुरुद्वारे।
संत, विधायक, सांसद, नेतागण क्‍या सारे।
शीश झुकाते हैं इसको सब भारतवासी,
नीलगगन, कण-कण, धरती क्‍या  सभी सितारे।

यह ॠषि, मुनि, भरत भूमि का इक वरदान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
हरी भरी धरती हो रंग हरा कहता है।
सर्वधर्म समभाव है केसरिया कहता है।
मध्‍यचक्र शिक्षा देता है सजग रहें हम,
चलें शान्ति की राह श्‍वेत रंग यह कहता है।

अपनी कालजयी संस्‍कृति का यह गुणगान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
       तिरंगा---------- 
दशों दिशाएँ इसकी विरुदावली गाती है।
मलयानिल विन्‍ध्‍याचल हिमगिरि से आती है।
सुरभित पवन झकोरे सहलाते हैं परचम,
महिमा राष्‍ट्रीय पर्वों पर जनता गाती है।

अपना राष्‍ट्रीय गान और राष्‍ट्रगीत यशगान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
व़ीर शहीदों का यह ध्‍वज प्रतिदान है।
राष्‍ट्रीय चिह्नों मे यह प्रतीक प्रधान है।
यह अनमोल अतुल अक्षुण्‍ण है शिरो विभूषण,
यह भारत का उच्‍च शिखर सम्‍मान है।

राष्‍ट्रीय ध्‍वज से सुशोभित भारतवर्ष महान् है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
तिरंगा, अपने देश की आन, बान और शान है। 

12 अगस्त 2015

मन के कहीं बसेरे होते


मन के कहीं बसेरे होते 
ना उड़ते बन के यायावर
नहीं होते अपनों से दूर।

गगन कुसुम की चाहत इतनी
दूर गगन भी छाँव से लगे।
राह भले ही आग धधकती।
प्‍यासे मरुधर गाँव से लगे।

धता बताते पलकों के दर 
चंचल मन के पाँव से लगे।
चंदा से अभिलाषायें ले 
और जिन्‍दगी दाँव सी लगे।

मन के कई न चेहरे होते
कहीं ढूँढ़ते चारागर क्‍यों
नहीं रहते अपनों से दूर।

दीवानापन खोता आया
चैन दिहाड़ी जैसा जीवनं।
धूल धमासा रोड़ी गिट्टी
खाली हाँड़ी जैसा जीवन।

साँस साँस की गति ताल में
फि‍र भी ताड़ी जैसा जीवन।
नशा भरे अपने पाँवों में
मन मारों का जैसा जीवन।

मन के कहीं अँधेरे होते
जाके छिपते तब ज्‍यादातर
कहीं रहते अपनों से दूर।

मन के कहीं बसेरे होते। 


11 अगस्त 2015

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ




चलो साथियो मिल के घर घर इक अभियान चलायें ।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

माँ की गोद हरी हो जब बेटी से सब कहते हैं।
लक्ष्‍मी सुख समृ‍द्धि ले कर आई है सब कहते हैं।
कुल कुटुम्‍ब का मान बढ़ाती इसका मान बढ़ायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

भेद भाव ना कभी करें बेटी-बेटे होने पर।
सभी बनेंगे घर बगिया के फूल बड़े होने पर।
मात-पिता ही भाग्‍य बनाते उनको ध्‍यान करायेंं
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।
बेटी से होती है हर रिश्‍ते की एक अहमियत।
बेटी से ही बहिन, बहू, माँ की इक अहम हैसियत।
बिन बेटी के इस सुख से घर है सुनसान बतायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

बिन बेटी के ना हो पाते घर में कई व्‍यवहार।
नहिं हो पाते राखी भैया दौज कई त्‍योहार।
घर की शोभा है बेटी बहिना यह ज्ञान करायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।
इसे बचाओ, इसे पढ़ाओ, बेटी को हर सुख दो।
है भविष्‍य की बागडोर इससे इसको ना दुख दो।
देगी वह आशीष बढ़ायेगी कुल परम्‍परायेंं।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

बेटी बाबुल का गहना ससुराल की शान शराफत।
दोनों घर की लाज निभाये, करती सदा हिफ़ाज़त।
बेटी है नारी शक्ति का प्रथम सोपान बतायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

चलो साथियो मिल के घर घर इक अभियान चलायें ।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

28 जुलाई 2015

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: तैलंगकुलम् समाज का पाँचवा प्रतिभा सम्‍मान एवं लाइ...



सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: तैलंगकुलम् समाज का पाँचवा प्रतिभा सम्‍मान एवं लाइ...: सामुदायिक समन्‍वय, सौहार्द एवं सौमनस्‍यता सम्‍मान, साहित्‍य निधि सम्‍मान, विशिष्‍ट कला- साधना सम्‍मान, रंग पथिक सम्‍मान और रामादेवी भट्ट स...

25 जुलाई 2015

आईने से क्‍या कोई झूठ बोल सकता है (ग़ज़ल)

आईने से क्‍या, कोई झूठ बोल सकता है।
बिना चाबी क्‍या, कोई कुफ़्ल1 खोल सकता है।
सच्‍चाई छिपती नहीं सात परदों में भी,
तराजू में क्‍या, कोई हवा तोल सकता है।
भलाई का सिला मिलता है सदा भलाई से,
समंदर में क्‍या, कोई ज़हर घोल सकता है।
हो जीने का अंदाज़, दुनियादारी की सिफ़त,
जिसके पास क्‍या, कोई दिल डोल सकता है।
दोस्‍त फ़रिश्‍ते होते हैं, बाक़ी सब रिश्‍ते होते हैं,
जो दोस्‍ती क्‍या, रिश्‍ते भी बना अनमोल सकता है।
‘आकुल’ आईने की मानो जो दोस्‍त भी है नहीं तो
किसी से भी क्‍या, कोई मन की बैठ बोल सकता है।


1. कुफ़्ल- ताला  

24 जुलाई 2015

18 जुलाई 2015

ग़ज़ल

रह जाते हैं ज़िंदगी में, अनसुलझे कुछ सवाल अकसर।
रह जाते हैं तिश्‍नगी1 में, अनबुझे कुछ सवाल अकसर।
मुसव्विर2 भी कभी-कभी मुत्‍मईन3 नहीं होते अपने फ़न से,
रह जाते हैं शर्मिंदगी में, अनकहे कुछ सवाल अकसर।
संगतराश4 की नज़र का सानी नहीं होता फि‍र भी,
रह जाते हैं तस्‍वीर में अनछुए कुछ कमाल अकसर।
दर्द की रौ में न बहे अश्आर5 वो ग़ज़ल ही क्‍या,
रह जाते हैं ग़ज़ल में न बयाँ किए कुछ मिसाल अकसर।
दस्‍ते शफ़क़त6 में चूक से नाशाइस्‍ता7 हुए हैं कई गुफ़्ल8,
रह जाते हैं गुलज़ार में गुल हुए कुछ हलाल अकसर।
किस्‍साकोताह9 कि मुहब्‍बत में फ़ना होते हैं परवाने ‘आकुल’,
रह जाते हैं तारीख़10 के सफ़्हों में उलझे कुछ सवाल अकसर।


1-तिश्‍नगी- प्‍यास 2- मुसव्विर- चित्रकार 3- मुत्‍मईन- संतुष्‍ट 4- संगतराश- शिल्‍पकार 5- अश्आर- शेर 6- दस्‍ते शफ़क़त- छत्रछाया 7- नाशाइस्‍ता- असफल  8- गुफ़्ल- अनुभवहीन व्‍यक्ति 9- किस्‍साकोताह- सारांश, किंबहुना 10- तारीख़- इतिहास।

17 जुलाई 2015

डा0 रघुनाथ मिश्र 'सहज' पर कुण्‍डलिया छंद

डा0 रघुनाथ मिश्र *स‍हज*
विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के
अधिवेशन में सम्‍मान लेते हुए
1
सागर सा व्‍यक्तित्‍व है, जोश अपार अथाह।
जनवादी आक्रोश का, बहता काव्‍य प्रवाह।
बहता काव्‍य प्रवाह, चतुर अभिभाषक भी हैं।
मणिकांचन संयोग, मिशन प्रचारक भी हैं।
‘आकुल’ है कृतकृत्‍य, 'सहज' सा साथी पा कर।
बदल दिया संसार, भरा गागर में सागर।     
2
'सहज' सहज हैं सहज से, कह देते हैं बात।
बिना रुके वे सहज से, कहने में निष्‍णात।
कहने में निष्‍णात, विषय कोई सा भी हो।
कहते हैं बेबाक, सदन कोई सा भी हो।
कविपुंगव ने काव्‍य, रचे वे 'स‍हज' सहज हैं।
मेरे हैं वे दोस्‍त, बिलाशक 'सहज' सहज हैं। 

13 जुलाई 2015

निश्‍चय ही सिरमौर, बनेगी अपनी हिन्‍दी (कुण्‍डलिया छंद)

1-
हिन्‍दी की बस बात ही, करें न अब हम लोग।
मिलजुल कर अब साथ ही, देना है सहयोग।
देना है सहयोग, राजभाषा है अपनी।
नहीं बनी अब तलक, राष्‍ट्रभाषा यह अपनी।
होगा जन-जन नाद, प्रखर तब होगी हिन्‍दी।
लेंगे जब संकल्‍प, शिखर पर होगी हिन्‍दी।।
2-
मोबाइल की क्रांति से, सम्‍मोहित जग आज।
वैसी ही इक क्रांति की, बहुत जरूरत आज।
बहुत जरूरत आज, देश समवेत खिलेगा।
कितनी है परवाज़, तभी संकेत मिलेगा।
इकजुट हो बस देश, अब हिन्‍दी की क्रांति से।
आया जैसे दौर, मोबाइल की क्रांति से। ।
3-
हिन्‍दी के उन्‍नयन को, बने राय मिल बैठ।
गाँव-गाँव अभियान से, सभी बनायें पैठ।
सभी बनाये पैठ, सोच सबकी बदलेगी।
निज भाषा का गर्व, नयी इक दिशा मिलेगी।
कह 'आकुल' कविराय, अनोखी अपनी हिन्‍दी।
निश्‍चय ही सिरमौर, बनेगी अपनी हिन्‍दी।। 

12 जुलाई 2015

अकसर लोग कहा करते हैं

 
 
अकसर लोग कहा करते हैं
लोक लुभावन मिसरे
धूप हवा में धूप बड़ी।
 
कुछ पंछी स्‍वच्‍छंद विचरते
कुछ पिँजरों में कैदी
चहका करते हैं फि‍र भी
कुछ खूँखार वनों में रहते
कुछ पहरों में कैदी
सुविधा पाते हैं फि‍र भी
 
अकसर लोग कहा करते हैं
जीवन दर्शन सारा
अहं, रूप, धन चार घड़ी।
 
भँवरों के गुंजन से छूटे
पट्टबंध कलियों के
बागबान की कौन सुने?
कस्‍तूरी कुण्‍डल में बसती
वही गंध सदियों से
व्‍यथा मृगों की कौन सुने ?
 
अकसर लोग कहा करते हैं
कितने भी हों खतरे
मृगतृष्‍णा में धूप जड़ी।
 
प्रस्‍तर युग के मानव चढ़ कर
आसमान पर बैठे
लिए बुद्धि बल प्रेम आलाप
बदली हवा समय भी बदला
फि‍र भी हाथ धरे बैठे
ना प्रकृति का तनिक विलाप
 
अकसर लोग कहा करते हैं
खुशियाँ सुख चौखट पर
रुकते हैं दो चार घड़ी।
 
अकसर लोग कहा करते हैं।
 

3 जुलाई 2015

मेरे घर आँगन में गौरैया नित आओ

मेरे घर आँगन में, गौरैया नित आओ।।

ढेर परिंडे बाँधे, कई नीड़ बनवाये।
विकसित किया सरोवर, कई पेड़ लगवाये।
खुशबू से महके घर, मेरा नंदन कानन,
जूही, चंपा कनेर, हरसिंगार लगाये।

आओ गौरी मैया, घर परिवार बसाओ।।

तुम जो रोज सवेरे, आकर गा जाती थींA
बिना घड़ी के ससमय, हमें जगा जाती थीं।  
कैसा रिश्‍ता था वह, कैसी परिपाटी थी,
समझे नहीं आज तक, जो समझा जाती थीं।
 
अब समझे हैं आओ, कुछ नवगीत सुनाओ।।


खा कर दाना चुग्गा, फुदको डाली डाली।
यहाँ नहीं आएगा, कोई हाली माली।
कोई फि‍क्र ना कोई, बंधन ना बहेलिया,
नीचे उपवन ऊपर, नील गगन की थाली।
 
जिस कोने में चाहो, अपना नीड़ बसाओ।।

तुम मानव की बस्‍ती, निकट रहो जन्‍मांतर।
विचरण करो सदा ना, बनो कभी यायावर।
गगन बहुत सूना है, प्रकृति है खोई खोई,
शुरूआत करनी है, तुमको यहाँ बसा कर।

सब पंखी आऐंगे, तुम भी प्रीत बढ़ाओ।।   

1 जुलाई 2015

राम से नेह लगाया कर

राम नाम संकीर्तन कर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू ,  तर जाएगा प्राणी।।

 भवसागर से भरा हलाहल, क्‍या बिसात है तेरी।
बिना पिये ना निकल सकेगा, क्‍या औकात है तेरी।
राम की नैया से ही पार, उतर पाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,------------------।।

धन्‍य है केवट की भक्ति, प्रभु राम के पैर धुलाए।
धन्‍य है शबरी की भक्ति, प्रभु राम को बेर खिलाए।
भज मन राम धन्‍य जीवन तू, कर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

राम भक्‍त हनुमान हुए हैं, अमर है जिनकी गाथा।
जिनके हृदय बिराजे राम, लखन और सीता माता।
हृदय बसा श्री राम जपा कर, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

घर भेदी ने लंका ढाई, ये दुनिया ने जाना।
रामराज्‍य आया घर घर वहाँ, क्‍या सबने ये जाना।
भक्‍त विभीषण सा बन जा तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

व़न-वन गाँव-गाँव घूमे, रघुवर ने अलख जगाई।
नर, नारी, पक्षी, पशु सबको, धर्म की राह बताई।
ऐसी भक्ति कर भवसागर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

मोह में प्राण गये दशरथ के, अहं से रावण हारा।
पत्‍थर बनी अहल्‍या तारी, बाली भी संहारा।
रोम-रोम श्रीराम बसेंगे, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

क्रोध, अहं, मोह बर्बरता ,से बल सु‍बुद्धि भरमाई।
शिवधुन उठा न अंगद पैर, न लंका ही बच पाई।
क्षणभंगुर सा जीवन पावन, कर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर-------------------।।

ऱाम नाम संकीर्तन कर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया करतू, तर जाएगा प्राणी।।