20 अक्तूबर 2017

खाली होगी कभी न झोली (गीतिका)

छंद- द्विगुणित चौपाई
पदांत-लेले 
समांत- अता

सूरज से अपने तन को तप, चंदा से शीतलता लेले. 
पेड़ों से तू ले नम्रता, फूलों से मादकता लेले.   

सीख अँधेरे से तू छिपना और उजाले से छा जाना,
समय साध निश्चिंत बनेगा, उससे ये सक्षमता ले ले   

ज्‍यों गिरि स्‍वत: बनाते हैं वन, होते हैं प्रशांत सागर भी,
दावानल बड़वानल कभी न चेतें, ये चेतनता ले ले.  

स्‍वर्ग धरा बन जाए आकुल, मानव छले न काश प्रकृति को
निस्‍सृत जड़ी है संजीवनि, प्रकृति से अजर अमरता ले ले

मान न मान ये सब कर पाया, कर्म अगर जीवन में ‘आकुल’, 
खाली होगी कभी न झोली, इतनी घोर सफलता ले ले.

19 अक्तूबर 2017

मेरा भारत है पर्वों, त्‍योहारों, मेलों का देश (गीतिका)

पदांत- है
समांत- अहना


दीवाली दीपों से सजती, होली रंगों का गहना है।
इन पर्वों से ही इंसानों, ने मिल कर सीखा रहना है ।।1।।

मेरा भारत है पर्वों, त्योहारों, मेलों का देश यहाँ,
गंगा-यमुना की संस्कृति ने, धर्मों का बाना पहना है।।2।।

राष्ट्रिय पर्वों पर सर्व-धर्म, समभाव लिए सब जुड़ते हैं,
इस मातृभूमि की रक्षा को, हर दुश्मन का गढ़ ढहना है।।3।।

बहला न सका दुश्मन अब तक, उसने मुँह की ही खाई है,
सीखा है गर्म हवाओं में, सब ने इक रौ में बहना है।।4।।

सौहार्द, प्रेम, निष्ठा से, जग जीता है, पर्व मनायें हैं,
क्या गीता-रामायण-कुरान, हर ग्रंथों का यह कहना है।।5।।

18 अक्तूबर 2017

ज्‍योति-पर्व (गीतिका)

जब इक दीपक से होता है शुभारंभ, 
करने को दूर अंधकार का साम्राज्य.
आओ करें हम ज्योति पर्व पर आज ही,
दृढ़ संकल्प हो अब दीपों का साम्राज्य।।1।।


घर-घर में जब दीप जलें उत्साह भरे,
मनती हर घर में खुशियों की दीवाली,
साफ-सफाई, रँग-रोगन, कोना-कोना,
सब ही घरों में हो शुचिता का साम्राज्य।।2।।

घर वंदनवारों, रंगोली से शोभित,
धूम पटाखों की लक्ष्मी का हो आह्वान,
श्रीगणेश के संग बिराजें सरस्वती,
हो धन, लाभ-शुभ, बुद्धि,वृद्धि का साम्राज्य।।3।।

जो धन के मद में रहता हर दम आकुल
बने दिवाला वह अकसर ही दीवाली पर,
उसके जीवन में खुशियाँ भी आती तो हैं,
खुशियों से वंचित रहता उसका साम्राज्य।।4।।

आओ अब इस ज्योति पर्व के अवसर पर
फैलायें उन्नति समृद्धि का हम प्रकाश,
हटे घोर अवसाद, द्वेष का अंधकार,
जले अखंड ज्योति हो प्रेम का साम्राज्य।।5।।

16 अक्तूबर 2017

प्रख्‍यात वार्णिक छंदों पर रचनायें

किरीट सवैया (भगण X 8)
211 211 211 211 211 211 211 211
चाह नहीं कि भरा घर हो धन-दौलत नौकर-चाकर हो प्रभु.
चाह नहीं कि बराबर हो मुझ सा न कहीं घर-बाहर हो प्रभु.
चाह यही प्रभु 'आकुल' की न कदापि निरादर हो उस से बस,
चाह यही कि जरा-तन से बस दानवता न उजागर हो प्रभु.

छंद - " मदिरा सवैया " (वर्णिक ) मुक्‍तक
211 211 211 211 211 211 211 2
1+1=2 वर्जित है
[सात भगण (s।) + गुरु]
चाह नहीं कि भरा घर हो धन-दौलत नौकर-चाकर हो.
चाह नहीं कि बराबर हो मुझ सा न कहीं घर-बाहर हो.
चाह यही प्रभु 'आकुल' की न कदापि निरादर हो उस से,

चाह यही कि जरा-तन से बस दानवता न उजागर हो.


24 घनाक्षरी// मनहरण कवित्‍त (वार्णिक)
विधान- 8,8,8,7, पूर्ण वर्णों की गणना ही.
1
भोर भई लाली लख, नीड़ सौं छूटें है खग
भयो चहुँ ओर रव, आज होरी आई है.
ग्‍वाल बाल श्‍याम संग, लिये पिचाकारी रंग
झाँझ अलगोजा चंग, बाँसुरी बजाई है.
नारि नर अटारी सौं, द्वार सौं तिबारी सौं
रंग कूँ उड़ाय चले, गारी भी सुनाई है.
गाय के धमार छंद, साँवरे आनंद नंद
रंग में रँगाय के दी, होरी की बधाई है. 
2
सारौ बिंदावन धाम, गोकुल व नंदगाम
और बरसाने की तो, होरी जो मनाहि है
रेणु भी अबीर बने, कालिंदी को तीर बनै
ब्रजबासिनों के संग, होरी जो खिलाहि है
बड़भागी बने कोय, जनम सफल होय
फल गोलोक सो जन्‍म, धन्‍न ही बनाहि है   
आज भी कहें पथिक, होरी के सभी रसिक
नारिन में बिरज की, राधा ही समाहि है.


छंद - मत्तगयंद सवैया (वार्णिक छंद )
शिल्प विधान- 7 भगण +22
मापनी - 211 211 211 211 211 211 211 22

(उक्त छंद में गुरु के स्थान पर दो लघु की छूट नहीं होती है।)

1
पीर हि पीर ब सी मन  में, कछु  सूझत  नाहि क हूँ कछु  द्वारे.
नंदकुमार हमार सखा, बहु साथ रहे सँग साँझ सकारे.
जाय कहो नट नागर सौं हम विप्र सुदाम हुँ मित्र तुम्‍हारे.
बाँध कठोर कियो मन जाय कही मुख द्वारहुँ जाय के ठारे
2
जौंहि कहौ कि सुदाम खड़े झट लेउत्‍तरि बेगहिं किलकारे
दौरि परे सुन मित्र सुदाम सुँ द्वारहि आकुल बाँह पसारे.
बोल सके न कछू उर भींच सुदाम भि बोल सकै कछु नारे
देख भये चकिताचित द्वार हुँ रानिजु रुक्मिनि कौन पधारे.

14 अक्तूबर 2017

पत्‍थर दिल भी गाना सीख ले



छंद- गीतिका
मापनी- 2122 2122 2122 212
पदांत- सीख ले
समांत- आना

डर न सबको साथ ले तू डर भगाना सीख ले.
जो नहीं डरता उसी का है जमाना सीख ले.

फूल ने क्‍या शूल से डर कर न दी खुशबू कभी, 
कंटकों की राह में तू पग जमाना सीख ले.

दु:ख दे जाता न हँसने की सज़ा अकसर हमें
बीच में बच्‍चों के’ रह कर खिलखिलाना सीख ले.

चाह छूने की गगन को, वो जमीं से बेखबर,
तू जमीं बंजर न हो पौधे लगाना सीख ले.     

मेघ बरसें पर्वतों पे वन घने बसते स्‍वयं
प्‍यार यूँ बरसे कि पत्‍थर दिल भी’ गाना सीख ले.