25 अक्तूबर 2017

ये कैसी है परवाज (गीतिका)

छंद- शक्ति 
मापनी- 122 122 122 12 

ये’ कैसी है’ परवाज़, कैसी लगन.
उड़े जा रहा मन तू’ हो के मगन.
 
न परवा है’ कोई न कोई है’ डर,
है’ किस की ज़मीं ये, है’ किसका वतन.

उमर ही है’ ऐसी कि बँधना नहीं,
मुहब्‍बत के’ पंछी हैं’, सँग है सजन.

नहीं सख़्ति‍यों से बहकते कभी,
न होती है’ मुखड़े पे’ कोई शिकन.

किसी भी जगह पर ठहरना नहीं
कहीं भी जगर हो कहीं भी शयन.

वहीं आशियाँ ढूँढ़ते हैं सदा,
जहाँ प्रेमियों के हुए हैं मिलन.

चले हमसफ़र साथ है क्‍या है’ ग़म,
न धरती मिली तो मिलेगा चमन.

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