29 अक्तूबर 2017

कुछ मुक्‍तक

उत्कृष्ट
उत्कृष्ट वह जो इष्ट का उत्कर्ष दे.
उत्कर्ष के लिए अभीष्ट संघर्ष दे.
साधना, उपासना और सत्कर्म से,
सिद्ध कर दे जो मनोरथ अति हर्ष दे.

निकृष्ट
निकृष्ट वह जो आदर्शों का न सम्मान करे.
सिद्धांतों और नियमों का जो अपमान करे.
तुच्छ है हर वो इष्ट जो हो स्वार्थ से प्रेरित,
अभीष्ट के लिए जो व्यर्थ अनर्गल गान करे.
मुक्‍तक
भोर होती है, लिए एक उत्‍साह.
जिंदगी को देती है नेक सलाह.
कुछ कर गुजर न लौटेंगे फिर ये पल,
लूट वा-वाह या बैठ के भर आह.  
मुक्‍तक
नहीं जानती जीना कितना दुखदायी होगा.
इक पल में सपनों का महल धराशायी होगा.   
फैंके पत्‍थर मेरे घर पर कहा जमाने ने,
काश खबर होती कि तू इक आततायी होगा.
उद्यम
पूँजी दे बस ब्‍याज ही , भाड़ा भवन दिलाय.
कर्माश्रय भृति ही मिले, साहस भाग्‍य जगाय.
उद्यम ही सत्कर्म है, कर्म बिना सब व्‍यर्थ,         
भृति, पूँजी, साहस, भवन, ये ही अर्थ प्रदाय.
आलस्‍य
कर्मनिष्‍ठ होते सबल, कर्मठ भाग्‍य बनाय.
कर्म करे सब कुछ मिले, कर्महीन से जाय.
कर्महीन आलस्‍य से, लुटे खोय हर चीज,
समय बिसारे हर दफा, समय न वापिस आय.

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