26 जनवरी 2017

आओ मनायें स्‍वतंत्रता-अपनत्‍व का गणतंत्र

26 जनवरी 2017 का आयोजन  



आओ मनाएँँ स्‍वतंत्रता-अपनत्‍व का गणतंत्र

गीतिका  
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पदांत- का गणतंत्र 
समांत- अत्‍व

आओ मनाएँ स्वतंत्रता-अपनत्व का गणतंत्र. 
आओ-मनाएँ, सहभागिता-समत्व का गणतंत्र.

दिखलाई दे उत्सव, पर्व, त्यो‍हार पर बंधुत्‍व, 
आओ मनाएँ कृतज्ञता-सिद्धत्व का गणतंत्र.

न हो कोई प्रमाद, जातिगत भेदभाव या द्रोह, 
आओ मनाएँ सम्बद्धता-महत्व का गणतंत्र.

भ्रष्टाचारी, आतंकी, दुष्कर्मी, का हो नाश,
आओ मनाएँ वत्सलता-बुद्धत्‍व का गणतंत्र.

अतिथिदेवोभव धर्म, कर्म हो नीर-क्षीर विवेक, 
आओ मनाएँ सदा अमरता-तत्व का गणतंत्र.

25 जनवरी 2017

है प्रभुत्‍व नारी का

गीतिका 

क्‍या दंगल क्‍या खेल, सभी में है प्रभुत्‍व नारी का.
क्‍या धरती क्‍या आसमान में है प्रभुत्‍व नारी का.

सत्‍ता की ऊँचाई हो या, भद्र प्रशासन का पद,
रंगमंच, तीनों सेना में है प्रभुत्‍व नारी का.

पर्वों त्‍योहारों में सर्वोपरि सम्‍मान निहित है,
घर की हर परम्‍पराओं में है प्रभुत्‍व नारी का.

संस्‍कार की नींव डालती बच्‍चों में घर-घर में,
संरक्षण की बागडोर में है प्रभुत्‍व नारी का.

ममता की मूरत है, सेवा भाव अटूट भरा है,
माँ, बेटी क्‍या बहू, बहिन में है प्रभुत्‍व नारी का.

मंगल सूत्र पहन मंगल की करे कामना सब की,
अस्मिता से विचलित स्मिता में है प्रभुत्‍व नारी का.   

निष्‍काम कर्म की प्रतिमूरत, देवी है, श्रद्धा है,
जीवन के हर संस्‍करण में है प्रभुत्‍व नारी का.

24 जनवरी 2017

जो जीत के न पा सके

गीतिकाा

छंद- नराचिका  
वाचिक मापनी पर आधारित
2212 1212


जो जीत के न पा सके
वो रीति से न पा सके

जो पालता है दंभ को
वो नीति से न पा सके

हैं वीर वो स्‍वदेश की
सेवा में’ काम आ सके

वो राज है जहान में
जो प्रीति से बना सके

बी‍ती वही बिसारते
जो वर्द्धमान ला सके

23 जनवरी 2017

देख सको तो देखो

(गीतिका)
छंद- ‘सार’ 
मात्रिक भार - 16-12
पदांत- देख सको तो देखो
समांत- अत
रुके हुए पानी की हालत, देख सको तो देखो.
बेघर बेचारों की आफत, देख सको तो देखो.
जिनके सिर पर हाथ नहीं है, उन अनाथ की आँखें,
भूख-प्यास की बेदम राहत, देख सको तो देखो.
नारी की अस्मिता बचेगी, कैसे जब दुर्जन में,
तन की भूख बनेगी हाजत, देख सको तो देखो.
नारी कैसे चंडी-दुर्गा, बन कर संहारेगी,
घर बच्चे होंगे तब आहत, देख सको तो देखो.
इक दिन अबला छोड़ मोह घर-बार बाल-बच्चों का,
’आकुल’ बने बला की ताकत, देख सको तो देखो.

16 जनवरी 2017

दो मुक्‍तक

1. मकर संक्रांति
देश काल अब नूतन करवट बदल रहा है.
सूर्य संक्रमण कर अपना पथ बदल रहा है.
आज एक मृत्‍युंजय का निर्वाण दिवस है,
भीष्‍म प्रतिज्ञा करें जीवन पथ बदल रहा है.



2. दान-पुण्‍य 
दान-पुण्‍य हो, दान-धर्म हो या हो जीवन धर्म.
रक्षा इसका कवच दयानिधि है जीवन का मर्म.
हर युग में है दान-पुण्‍य से बना मनुष्‍य महान्,
क्‍या दधीचि क्‍या कर्ण सभी का दान-पुण्‍य सत्‍कर्म.



10 जनवरी 2017

तीन मुक्‍तक

विश्‍व हिन्‍दी दिवस की शुभकामनाएँँ 

1
आजादी से पहले बिरतानिया में सूरज नहीं कभी अस्‍त होता था.
अत्‍याचार तब देश में भारतीयों पर दिनोंदिन जबरदस्‍त होता था.
काश हिंदी राष्‍ट्रभाषा तय हो जाती हर भारतीय तब देश के लिए,
हिन्‍दी हैं हम वतन है हिन्‍दोस्‍ताँँ हमारा, गाता और मस्‍त होता था.
2

आदमी आलस्‍य त्‍याग नई ऊर्जा भरते हैं जब सूर्य उदय होता है .
पंछी भी नई ऊर्जा ले परवाज भरते हैं जब सूर्य उदय होता है.
प्रकृति भी अपनी अनुपम छटाएँँ बिखेरती है ऊर्जा ले कर सूर्य से,
जीवन सारे इसी ऊर्जा से उम्र तय करते हैं, जब सूर्य उदय होता है.
3
भूल-चूक लेनी-देनी, व्‍यवहार चला ऐसे जब से.
दुनियादारी निभी और घर-बार पला ऐसे तब से.
इसीलिए जड़ जमी हुई युग युग से भ्रष्‍टाचारी की,
लेन-देन की दौलत से व्‍यापार फला ऐसे तब से.   

9 जनवरी 2017

अगर आप से दिल लगाया न होता

वाचिक भुजंग प्रयात 
मापनी -- 122 122 122 122

(गीतिका)
पदांत - न होता
समांत - आया

अगर आप से दिल लगाया न होता.
हमें जिंदगी ने सताया न होता.

मुलाकात हर इक शरारत हुई थी,
हमें काश यह सब बताया न होता.

बहुत दूर तक आ गये अब सफर में
हमें चाहतों से जताया न होता.

गुजारे नहीं दिन कभी गर्दिशों में
जहाँ ने हमेशा जिताया न होता.

अगर जानते पूजते न बुत बनाके
महल ताज जैसा बनाया न होता. 

6 जनवरी 2017

सुबह किया सलाम

नवगीत

कुहरे में दुबके सूरज को
सुबह किया सलाम.
बया झाँकती गोख से
झूला गीला ओस में
पंछी सारे दुबक रहे
आस-पास पड़ौस में
रजत कटोरे से सूरज को
सुबह किया सलाम.
देख विवश सूरज को खग
चहक रहे डेरे में
 विवश बाथ भरने को वे
गगन ढका कुहरे में
मोती ओस कणों वाली
सुबह को किया सलाम.
पैर रुक रहे ओस देख
पहने थे जो मोजे
लोग कह रहे ओस देख
सूरज के भी रोजे़
अलसभोर में जागे जग को
सुबह किया सलाम.

5 जनवरी 2017

जिंदगी ने कभी हार मानी नहीं

(गीतिका)

मापनी- 212  212  212  212 
समांत- आनी
पदांत’ नहीं
(अरुण छंद)

जिंदगी ने कभी हार मानी नहीं
मौत ने की कभी महरबानी नहीं

मौत ने ठहर के जिंदगी को सुना
आदमी ने कभी बात मानी नहीं

वक्‍त ने खूब उसको दिये तोहफे
मात्र बचपन बुढ़ापा जवानी नहीं

वह गुरूर न करे काश जीते हुए  
हौसलों से कभी छेड़खानी नहीं

जिंदगी में करोगे वही है अमर  
मौत जिस्‍मानी’ दी है रू’हानी नहीं.

4 जनवरी 2017

तीन मुक्‍तक

1 (चित्राभिव्‍यक्ति)
चिडि़यों ने सीखा है जैसे पढ़ कर गाना गाना
देख चकित हैं जैसे यह सब, है जाना पहचाना.
चूँ-चूँ करती फुदक-फुदक कर, गौरैया गाती है,
आओ सखियो सीखें नये साल में नया तराना. 
2
समय अनुकूल हो, सफलता के आसार बढ़ जाते हैं.
अपनों से दूरियाँ, गैरों के व्यवहार बढ़ जाते हैं.
सफलता का नशा भी कुछ ऐसा ही है जैसे 'आकुल',
चाँद को बढ़ता देख समंदर में ज्वार बढ़ जाते हैं.
3
समय प्रतिकूल हो तो, जहाँ में कुदरत भी बदल जाती है
गैरों को क्‍या दोष अपनों की फितरत भी बदल जाती है
कहते हैं समय मौसम की तरह आता-जाता है आकुल,
समय घाव भरता है, समय पर किस्‍मत भी बदल जाती है


2 जनवरी 2017

यह पथ है नववर्ष का

video
(दोहा गीतिका)

यह पथ है नववर्ष का, जुट जाओ नि:स्वार्थ 
जीवन पथ उत्कर्ष का, करने को पुरुषार्थ.

राग द्वेष सब भूल कर, संग मित्र परिवार,
कर गुजरो कुछ अनछुआ, बिन कोई हितस्वार्थ.

सब अपने सँग हैं तभी, है वसुधैवकुटुम्ब,
कुछ ऐसा कर जाइये, हो हर' कृत्य कृतार्थ.

अकर्मण्य को भी लिए, संग रखें यह सोच, 
होगा कुछ भवितव्य ही, उसका कोई स्वार्थ.

रामायण से सीखिए, मर्यादा की सीख, 
महासमर का पर्व हर, कर्म प्रवण निहितार्थ.

वेद पुराणों की धरा, गंगा यमुना तीर, 
सभी धर्म समभाव को, करते हैं चरितार्थ.

श्रीकृष्णशरणं मम भज, रे मानव दिड्.मूढ़, 
जीवन को तू धन्य कर, चल पथ पर सत्यार्थ.

यह वह भारत भूमि है, गीता जहाँ वरेण्य, 
है प्रधान बस कर्म ही, सीखा है जब पार्थ.

हर युग में बस कर्म से, जीता है विश्वास. 
अवतारों ने भी लिया, जन्म हेतु परमार्थ.

कर दें स्‍थापित सभी, जीवन मूल्य सधर्म, 
कर्मों से बन जाइये, वर्द्धमान, सिद्धार्थ.

नूतन वर्ष सुस्‍वागतम्

नववर्ष पर नवगीत 'नूतन वर्ष सुस्‍वागतम्' ई-पत्रिका 'अनुभूति' में प्रकाशित हुआ है. अनुभूति या नूतन वर्ष सुस्‍वागतम् स्‍पर्श करें और सीधे ई पत्रिका में नवगीत पढ़ें. 

1 जनवरी 2017

फिर आया नववर्ष (नवगीत)

फिर आया नववर्ष
भूल जाओं जो बीता.

धूल झाड़ के ख्‍वाबों को
बाहों में भर लो.
हरे-भरे उद्यानों को
राहों में कर लो.
काँटों को भी साथ रखो
अभिमान न आए,
राख हटा अंगारों को
दामन में भर लो.

रुका कहाँ है समय
चलता रहा जो जीता.

फिर अवसर आएगा
ढूँढों ये अथाह है.
इतिहास सदा हैं बनते
समय गवाह है.
बुद्धिमान मानव है पर
बुद्ध हैं कितने,
यसहिल कभी नहीं मरते
तूफ़ान गवाह है.

बना वही कर्मण्‍य
पढ़ता रहा जो गीता.

छोटी-छोटी खुशियों के
पल-छिन मत छोड़ो.
छोटी-छोटी बातों पे
अब मुँह मत मोड़ो.
कब कोई इक राह
बना जाएगी दुनियाँ,
छोटी-छोटीपगडँडियों पर
हाथ न छोड़ो

बना मसीहा सबके
दर्द रहा जो पीता.

हिंदी पर कुछ मुक्‍तक

1
आओ इस बात का अब वादा करें।
हिन्‍दी बने सिरमौर इरादा करें।
सबकी दृष्टि है हिन्‍दुतान पर अब,
इलिए प्रयत्‍न सबसे ज्‍यादा करें।
2
अब तक हिन्‍दी किसी ने, क्‍यों ध्‍यान नहीं दिया।
अब तक इस पर किसी ने, क्‍यों प्रसंज्ञान नहीं लिया।
अपने शिखर से सत्‍तर वर्ष वह, क्‍यों रहीं वंचित,
हिन्‍दी राष्‍ट्रभाषा हो संविधान, क्‍यों नहीं किया।
3
क्‍यों नहीं चाहते हिन्‍दी हो स्‍थापित सर्वोच्‍च स्‍थान।
क्‍यों नहीं चाहते हिन्‍दी गर्वित भारत का संविधान।
क्‍यों अंग्रेजी देवभाषा बनी बैठी हुई शिखर,
क्‍यों नहीं चाहते इक क्रांति हो आए प्रावधान।
4
हिंदी के अभियान को, इतना दें सहयोग.
लोगों से हर दिन कहें, इसका करें प्रयोग.
जनता ही है जनार्दन, जनता ही सरकार
जन जन से ही बढ़ेगा, हिंदी का उपयोग. 
5
नहीं प्रशासन जागता, नहीं जगे सरकार
जब तक जनता में नहीं, मचता हाहाकार.
क्‍या हिंदी के वासते, होगा कभी बवाल,
जूँ रेंगेगी कान कब, हे जनता सरकार.
6
शिक्षा हो अब देश में, हिंदी में अनिवार्य.
अंग्रेजी ऐच्छिक बने, हिंदी में हो कार्य.
कक्षा छ: से था हुआ, अंग्रेजी का ज्ञान,
ऐसा ही अब हो चलन, शिक्षा में स्‍वीकार्य.