8 मई 2022

उसका आँँचल भरना है

गीतिका

छंद- लावणी/कुकुभ/ताटंक

विधान- 30 मात्रा भार, 16, 14 (चौपाई +14) पर यति अंत एक/दो/तीन गुरु से
पदांत- है
समांत- अना
छिपा हुआ मेरी रग-रग में, बस माँ का हर सपना है।
सब माँ का ही है, कहने को, यह तन मेरा अपना है।
उसने ही तो मुझे बुलाया, कहा दिखाया सुंदर जग,
तुझको मेरी आशाओं की, गोद हरी अब करना है।
हाथ-पाँव क्या, चाल-ढाल क्या, नाक-नक्श बातें मेरी,
कहते हैं सब माँ सा है क्या, मन भी माँ के जितना है।
निश्छल स्वार्थ बिना जीवन में करे समर्पण माँ हरदम,
तत्पर रहती सोच-विचार बिना दुख चाहे कितना है।
माँ की ममता कोई भी क्या, मोल कर सका है अब तक,
उऋण रहूँगा खुशियों से अब, उसका आँचल भरना है।

2 अप्रैल 2022

नव संवत्‍सर

 


1

ज्ञान ध्‍यान दे सुसंज्ञान दे, शक्ति-भक्ति का विधि-विधान दे,

माया, साया संग निरोगी काया दे पर नि‍रभिमान दे,

वंशवृद्धि और सुख समृद्धि दे रिद्धि-सिद्धि में दे अभिवृद्धि,

मय सद्भाव प्रेम-प्रीति यह नव सम्‍वत्‍सर ससम्मान दे।


2

     मत देना, ऐसा अभाव प्रभु, मत्‍सर का स्‍वभाव, पालूँ,     

  न हाव-भाव, न मनोभाव में, द्वेष मोह माया पालूँ,  

जीवन हो उर्जित, सम्‍वत्सर, का प्रभाव इतना हो बस,

बीते, हितार्थ, शेष जीवन, दुर्भाव कभी भी ना पालूँ।

21 मार्च 2022

अनमोल जिंदगी इसे रखना सँभाल कर

छंद- अवतार (मात्रिक)

विधान- मात्रा भार 23। 13, 10 पर यति  

सहायक मापनी- 2212 1212 2212 12 

पदांत- कर    समांत- आल  

अनमोल जिंदगी इसे, रखना सँभाल कर।

हर आंधियों का' सामना, करना सँभाल कर।1।

जो भी कदम उठा सको, पीछे न खींचना,

हैं कंटकीर्ण मार्ग पग, धरना सँभाल कर।2।

क्‍यों शर्म क्‍यों करें बहाने, झूठ कब छिपा,

संकट टले असत्‍य से, कहना सँभाल कर।3।

शिक्षा सिवा नहीं कहीं, कोई विकल्‍प है,

कोई विषय बुरा नहीं, चुनना सँभाल कर।4।

यह जिंदगी रुकी नहीं, चलती रही सदा,

आगाह तो करे समय, चलना सँभाल कर।5।

10 मार्च 2022

उँगली से बढ़ कर जीवन में देखा नहीं उदार

गीतिका

छंद- सरसी 

संक्षिप्‍त विधान- मात्रा भार- 27. 16, 11 पर यति, सम चरण दोहे के समान, इसलिए अंत गुरु-लघु  आवश्‍यक  

पदांत- 0,  समांत- आर

उँगली से बढ़ कर जीवन में, देखा नहीं उदार ।

तन में गाँँठ रखे फिर भी वह करती है सहकार ।1।

लंबाई में सभी उँगलियाँँ, होतीं कब समरूप,

फिर भी रहती संग निभातीं, बस अपना किरदार ।2।

वक्त पड़े तो झुक कर, जुड़ कर मुट्ठी हरती पीर,

सामंजस्‍य रखे जीवन को, सरल अरु खुशगवार ।3 ।

घायल हो जाए इक उँगली, होता सबको दर्द, 

उसका दर्द बाँँटतीं मिलकर जब तक वह लाचार ।4।

लगी हथेली दसों उँगलियाँँ,जब हों तेरे संग 

दो-दो हाथ दिए हैं आकुल', खोल स्‍वर्ग के द्वार ।5। 

   

   

8 मार्च 2022

जैसे जीवन में हर सुविधा

 गीतिका

छंद- विष्णुपद (सम मात्रिक)
विधान- मात्रा भार-26। 16, 10 पर यति, अंत गुरु या गुरु वाचिक से।
पदांत- नहीं
समंत- अर्ज
जैसे जीवन में हर सुविधा, होती अर्ज नहीं ।
वैसे दुनिया में सब होते, हैं खुदगर्ज नहीं ।
दवा और रिश्ते दोनों ही, दर्दनिवारक हैं,
संबंधों में अंतिम तिथि बस, होती दर्ज नहीं ।
मात्र सफलता की तू कोरी, नहीं कल्पना कर,
कर्म सार्थक हो तो कोई होती गर्ज नहीं ।
साथ उम्र के, ऊपर चढ़ना, बहुत जरूरी है,
वर्द्धमान के लिए मुसीबत, होती हर्ज नहीं ।
चलता ही रहता है जीवन, अपनी ही लय पर,
रुकने की भरपाई ‘आकुल’, होती कर्ज नहीं ।

कहते हैं नारी खुश है तो, रहे सुखी परिवार

 विश्व महिला दिवस की शुभकामनाएँ

गीतिका
छंद- सरसी
विधान- मात्रा भार 27 (चोपाई+दोहे का सम चरण) 16,11 पर यति, अंत गुरु-लघु अनिवार्य
पदांत- 0
समांत- आर
कहते हैं नारी खुश है तो, रहे सुखी परिवार ।
सामंजस्य, त्याग, अपनापन, नारी के शृंगार । 1।
स्वाभिमान इतना ही रखना, लगे न दाँव न चोट,
नारी से ही दुनियादारी, नारी कुल आधार ।2।
घर-कुटुंब-कुल की खातिर वह, देती है सर्वस्व,
कंधे से कंधा दे उसको, दे उसको सहकार ।3।
दुनिया में नारी के चर्चे, नहीं समझना होड़,
मत आवाज दबाना उसका, बस व्यक्तित्व निखार ।4।
मातृभूमि पर बलिहारी की, गाथा मिलें अनेक,
है इतिहास साक्ष्य वारी है, कोख हजारों बार ।5।
युग बदले नारी को जब-जब, पुरुषों ने दी चोट,
नारी के ही आर्त्तनाद पर, हुए सभी अवतार ।6।
‘आकुल’ नमन आज नारी को, भाए नव शृंगार,
रूप अनेकों धर कर उसने, कर दी है हुंकार ।7।

7 मार्च 2022

नहीं कोयल बनाते नीड़

 गीतिका

छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- में
समांत- आने 

(कागा और कोयल की अदावत पर)
नहीं कोयल बनाते नीड़, रह जाते हैं' गाने में ।
सदा कोयल पले हैं काक, के ही आशियाने में ।1।
सदा छिप कर ही गाते गीत, छिप कर चौकसी करते,
न समझे काक क्या है राज, छिप कर गुनगुनाने में ।2।
भले ऐयार है कागा, मगर कोकिल न कम शातिर,
लड़ा करते बँटाने ध्यान, शिशुओं को बचाने में ।3।
मधुर स्वर सुन के कागा नीड़ में, यह सोच कर आया,
चलो गूँजेंगे' अपने भी, मृदुल स्वर अब घराने में ।4।
अलग रँग रूप ढब, कोकिल सा देखा, नीड़ में शिशु का,
मिला धोखा पला कोकिल, का' शिशु अपने ठिकाने में ।5।
उगे जब पंख, गाया जब, उड़े पिक संग, शिशु कोकिल,
तभी से है अदावत, काक-कोकिल की, जमाने में ।6।
हुत पीटा ढि़ढोरा काग ने, ताड़ा गया अकसर,
फिरे औघड़ बना वह, आज भी जग, आजमाने में ।7।
न मानी हार कागा ने, न कोयल सामने गाता,
युगों से पल रहा है वैर, कहते हैं फसाने में ।8।
सदा ‘आकुल’ कहे तू, मान या मत मान, यह सच है,
दिए जाते भुला अवगुण ,गुणी के जग में' छाने में ।9।
-आकुल

22 फ़रवरी 2022

जीवन इक सोता है, कर्मों को धोता है

गीतिका

छंद- विद्युल्‍लेखा (वाचिक) 

मापनी- 222 222

पदांत- है

समांत- ओता


जीवन इक, सोता है। 

कर्मों को, धोता है ।1।

जो लेता, है दिल पर, 

देखा ही, रोता है।2।

जो सेता, दु:खों को, 

पाता है, खोता है ।3।

तरसा है, फूलों को, 

काँटे जो, बोता है।4।

अकसर हर, निष्क्रिय ही,  

अवसर को, खोता है।5।

मन जैसा, हो हर-दम, 

ऐसा कब, होता है।6।

जीवन में, कर गुजरो, 

हर क्षण इक, न्योता है।7।

21 फ़रवरी 2022

पीछे न देखें वीर

 गीतिका

छंद- तोमर

मापनी- 2212 221

अपदांत, समांत- ईर

पीछे न देखें वीर ।

आपा न खोते धीर ।1।

कर्मठ जुझारू लोग,

बनते रहे हैं मीर ।2।

राजा बने हैं रंक,

लुटती रहीं जागीर ।3।

होता समय का फेर,

कहते कई तकदीर ।4।

अकसर सभी वाचाल

फैंकें हवा में तीर ।5।

औषधि जरूरी क्‍योंकि,

हरती रही  है पीर ।6।

करता नहीं जो अर्ज,

बनता न दावागीर ।7।

भरता नहीं जो कर्ज,

फटता उसी का चीर ।8।

‘आकुल’ कहे जो बात

 होती सदा अकसीर ।9।

18 फ़रवरी 2022

काक महिमा - 2 (दोहे)

1

कोयल का घर फोड़ कर, घर घर ढूँढ़े प्रीत । 

अब तक तो कोई नहीं, मिला काक को मीत ।।

2

बड़ बड़ बातें बोल कर, काक घटाते मान ।

चाहे चतुर सुजान हैं, नहीं मिले सम्‍मान ।।

3

दशाह घाट श्‍मशान या, श्राद्ध पक्ष में श्रेय ।।

मिले काकश्री को सदा, समझो उसे न हेय ।

4

काक चेष्‍टा भले ही, जग में हुई बखान ।

भूला जग अब तक नहीं, सीता का अपमान ।।

5

गो-ब्राह्मण बिन कनागत, दशा(ह) घाट बिन काक ।

सद्गति बिन उत्‍तर करम, जीवन ना बिन नाक ।।

6

कागा महिमा जान लो, पंडित काकभुशुंड ।

पर जयंत को भी मिला, एक आँख का दंड ।।

7

कागा की परिवार से, कभी न देखी प्रीति ।

औघड़ सा घूमे सदा, कौन सिखाए रीति ।।

8

कोयल बुलबुल कब लड़ें, करें न अतिक्रम, क्‍लेश ।

कागा का भी घर बसे, हो यदि चेष्‍टा लेश ।।    

9

मादा कागा दुखी है, कागा की मति देख,

नहीं चाह कर संग में, रहे भाग्‍य के लेख ।।

10

कहीं न क्‍यों पिक जा छिपे, लेता काक निकाल।

ऐयारी में काक की, कोई नहीं मिसाल ।

--00--

17 फ़रवरी 2022

करना मत मनमानी

गीतिका 
छंद- विद्युल्‍लेखा (वाचिक)
मापनी- 222 222 222 222 
पदांत- 0 
समांत- आनी
 
गतिरोधों, अवरोधों, की बातें बेमानी । 
सीमा पर तत्‍पर हर, दम रहते सेनानी । 

अनुशासन छूटेगा, आएँगी बाधाएँ,
झूठा ही हकलाता, सच का ना है सानी ।

पहरा हो, पग पग पर, खतरा भी, हो सर पर,
चोरों को, कब ताले, करते जो, है ठानी ।

क्‍या मिट्टी क्‍या सोना, क्‍या हीरा क्‍या पन्‍ना,
घर के भेदी से तो, लंका भी लुट जानी ।

इज्‍जत पाले सच्‍चा, खूँटी टाँगे झूठा,
होती है इस जग में, सबसे ही नादानी ।  

कण कण में बिखरे हैं, बलिदानों के किस्‍से, 

माँ पुजती है पन्‍ना, हाड़ी, लक्ष्‍मी रानी । 

‘आकुल’ अब कर गुजरो, चाहो यदि करना तो,
अवरोधों से डर कर,  करना मत मनमानी ।