24 अगस्त 2010

“जीवन की गूँज” जीवन से आप्‍लावित कृति-डॉ0 कंचना सक्‍सैना लोकार्पण सम्‍पन्‍न


जनकवि गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’ का काव्य संग्रह ‘जीवन की गूँज’ का लोकार्पण सादे समारोह में सम्पन्‍न हुआ। समारोह जनवादी लेखक संघ, कोटा द्वारा नयापुरा कोटा स्थित राजस्थान मेडिकल एंड सेल्स‍ रिप्रिजेन्टेटिव यूनियन कार्यालय, मारुति कॉलोनी के सभागार में दोपहर 2-45 पर आरंभ हुआ। जलेस के जिलाध्य‍क्ष श्री रघुनाथ मिश्र ने मुख्य अतिथि झलावाड़ से पधारे राजस्थानी के प्रख्यात कवि और वरिष्‍ठ साहित्यकार, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी और जलेस द्वारा ठाड़ा राही पुरस्‍कार से सम्मानित श्री रघुराज सिंह हाड़ा, अध्यक्ष हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार और राजकीय महाविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी प्रोफेसर औंकारनाथ चतुर्वेदी, प्रमुख वक्ता आचार्य ब्रज मोहन मधुर, डॉ0 अशोक मेहता, कृति परिचय के लिए पधारीं राजकीय महाविद्यालय कोटा की प्रवक्ता डॉ0 कंचना सक्सैना, कृतिकार गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’ को आमंत्रित कर मंच की स्थापना की और आमंत्रित सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संचालन के लिए राष्ट्रीय प्रशिक्षक(कैरियर गाइड) और सम्प्रेरक श्री सौरभ मिश्रा को आमंत्रित किया। सौरभ मिश्रा ने आरंभ से ही अपनी अनोखी शैली में कार्यक्रम का शुभारम्भ एलसीडी प्रोजेक्टर पर केप्शंस दिखाते हुए अतिथियों और उपस्थित जन समूह को मंत्रमुग्ध करते हुए अपनी सरल भाषा में हिन्दी और अंग्रेजी मिश्रित मोहक अंदाज में संचालन आरंभ किया और सर्वप्रथम श्री रघुनाथ मिश्र को कृतिकार ‘आकुल’ का परिचय देने के लिए आग्रह किया।
श्री मिश्र ने कृतिकार परिचय देने से पूर्व ‘आकुल’ के बारे में कहा-‘नहीं जाना था तो कुछ भी नहीं जाना था। जाना तो कुछ जाना। अब जाना तो यह जाना कि अभी तक तो कुछ भी नहीं जाना।‘ उन्होंने कहा कि आज आप जो कुछ जानेंगे, उसके बाद भी बहुत कुछ जानने को रह जाता है। आज कई पर्दे खुलेंगे। ऐसे और भी मनीषी साहित्यकार हैं जिन्हें यह शहर बहुत समय तक नहीं जान पाया, उनमें से आकुल भी एक हैं। 1996 में उनकी पहली नाट्य कृति ‘प्रतिज्ञा’ कोटा के भारतेंदु समिति में विमोचित हुई थी। उसके बाद से कोटा के साहित्य समाज से कोटा में रहते हुए भी श्री भट्ट गुमनामी की तरह अपनी साहित्य जीवन यात्रा करते रहे। श्री मिश्र ने भट्ट की दूसरी पुस्तक ‘पत्थरों का शहर’ के उनका प्रख्यात संवाद ‘दोस्त फ़रिश्ते होते हैं, बाक़ी सब रिश्ते होते हैं’ से आरंभ की और कहा कि यह एक ऐसा जुमला है, जिससे सारा देश जो ‘आकुल’ को जानता है या नहीं जानता चर्चाएँ करता है। इस पर 6-8 घंटे की संगोष्ठी की जा सकती है। हमारे मुख्य अतिथि महोदय ने स्वयं ने इसे सूक्ति कहा है। ‘आकुल’ का जीवन संगीत और साहित्य से ओतप्रोत रहा है। यह उनकी विशेषता रही है कि अपने साहित्य प्रकाशनों उन्होंने कभी संगीत यात्रा का परिचय नहीं दिया। अनेकों वाद्य बजाने में सिद्धहस्त आकुल ने प्रमुख की बोर्ड प्लेयर (सिन्थेसाइज़र) के रू‍प में देश के प्रमुख आर्केस्ट्राओं में अपनी विशेष पहचान बनाई। जब स्टेज कार्यक्रमों में केवल पिआनो अकार्डियन का चलन था तब राजस्थान में उन्होंने सर्वप्रथम सिन्थेसाइज़र की पहचान करायी और कोटा में सर्वप्रथम सिन्थेसाइज़र का प्रदर्शन करने का श्रेय भी श्री भट्ट को जाता है। आर्केस्ट्राज़ के साथ देश विदेश के लगभग 300 बड़े बड़े स्टेज कार्यक्रम दिये, जिन्हें वे अपने जीवन के यादगार प्रोग्राम्स मानते हैं। वैसे उन्होंने अपने 80 से 90 के दशक में सैंकड़ों प्रोग्राम्स दे कर एक स्थान बनाया। उन्होंने मथुरा वृन्दावन की कई रासलीला व रामलीला मंडली के साथ पार्श्वसंगीत दिया।
कृतिकार परिचय के बाद मंचासीन सभी अतिथियों ने किसलय कलाये से बँधी रेशमी उत्तरीय में लिपटी पुस्तेकों को अनावृत कर लोकार्पित किया। सभी पधारे अतिथियों के समक्ष करते हुए संवाददाताओं और दूरदर्शन चैनल्स के प्रतिनिधियों ने मंचासीन अध्यक्षीय मंडल को कैमरे में कैद किया।
पुस्तक के लोकार्पण के पश्चात् सर्वप्रथम डॉ0 फ़रीद अहमद ‘फ़रीदी,’ जो “आकुल” की पुस्तक ‘पत्थरों का शहर’ के सम्पादक रहे हैं, ने उनके सम्मान में पाँच छंदों वाली एक कविता “साहित्य का फ़रिश्ता” गा कर सुनाई और श्री भट्ट को आशीर्वाद और बधाई स्वरूप लेखनी भेंट दी।
कृति परिचय के लिए अपने उद्बोधन के लिए संचालक ने डॉ0 कंचना सक्सैना को आमंत्रित किया। डॉ0 कंचना सक्सैना ने अपने आलेख को नाम दिया ‘जीवन की गूँज’ जीवन से आप्लावित कृति। वे कृति के लिए हाशिया बाँधते हुए लिखती हैं कि लगता है आज सारे विशेषण नुच गये हैं, छिन गये हैं और रह गये हैं मात्र सर्वनाम, जो संज्ञा के क़रीबी दोस्‍त हैं। जब सर्वनाम ही रह गये हैं, तो ज़िन्दगी की दौड़ तेज हो जाती है। उस ज़िन्दगी की तरह, जो नामहीन हो गयी है। ऐसी ही ऊबड़-खाबड़, मधुर एवं तिक्त सम्बंधों की पहचान की है श्री भट्ट ने। इनको समझने के लिए एक ओर भीषण तपती आग की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर शीतल मन्द फुहार की। आज कवि अपनी ज़िन्दगी और उससे जुड़ी स्थितियों के ग्राफ आदमी की भाषा में उतार रहा है, नक्श कर रहा है, उन समूचे पलों को, जिसमें आदमी मर-खप रहा है, जी कर मिट रहा है और मिटते हुए भी एक स्थान, एक जिजीविषा के लिए हाँफ रहा है। युगबोध की अभिव्यंजना के साथ विरोधी भावों को उद्वेलित करना कवि के लिए इसलिये भी सम्भव रहा है कि ज़िन्दगी की हर धड़कन अथवा नब्ज़ को उन्होंने पूरी तरह टटोला है। समकालीनता हमेशा जीवन सन्दर्भों से जुड़ने में होती है। जो कवि देशकाल निरपेक्ष सार्वभौम और शाश्वत सत्यों पर बल देते हैं, वे सदैव समकालीनता से परे होते हैं, चाहे वे आज के कवि हों या पहले के। पहले के कवि भी आज के सच से जुड़े हुए हैं। भूमंडलीकरण के इस दौर में बहुत सारी हाशिये पर पड़ी चीजें प्रमुख हो गयी हैं। इसमें हाशिये पर धकेले गये साधारण जन भी उभरकर आए हैं। श्री भट्ट ने अपनी सूक्ष्मदर्शी दृष्टि से सभी विषयों को भावोर्मियों की लड़ियों में शब्दों के माध्यम से ऐसे पिरोया है कि पाठक मात्र आंदोलित हुए बिना नहीं रहता। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से आड़ोलित एवं आप्लावित आपकी चिन्तना निश्चय ही काल और समय की माँग के अनुकूल है। बाजारवाद एवं वैश्वीकरण के प्रभावस्वरूप उत्पन्न स्थिति में आम आदमी का संघर्ष, पीड़ा, घुटन, संत्रास के साथ रिसते हुए रिश्तों के प्रति कवि का सम्वेदनशील मन करुणाश्रु प्रवाहित करता है। 9 कालखंडों में रचित कविताओं को 240 पृष्ठीय पुस्तक में प्रश्रय मिला है। भावोद्गारों को ब्रज एवं राजस्थानी के रंग कलशों में न केवल उँडेला है, अपितु दर्शन और अध्यात्म को भी संस्पर्श किया है। कहीं शृंगार से प्रेरित, तो कहीं भक्ति से, कहीं बालहठ, तो कहीं प्राकृतिक सौंदर्य से आप्लावित। ब्रजभूमि का मोह संवरण लेखक नहीं कर पाये और स्थान स्थान पर उसे अपने काव्य में आश्रय प्रदान किया है। गृहस्वामिनी तथा जीवन के मोह ने शृंगारिक कविताओं को जन्म दिया है और मित्रों के सम्बल ने ‘सखा बत्तीसी’ का सृजन करवाया है। नयी कविता के पक्षधर होने पर उनकी कविता में वह ऊर्जा है, जो तुकान्त कविताओं में नहीं होती। यही कारण है कि जहाँ भाषा की दृष्टि से ‘आकुल’ प्रोढ़, परिष्कृत, परिमार्जित एवं परिनिष्ठित भाषा के धनी हैं, वहीं भाव की दृष्टि से भी कविता प्राणवान् और ऊर्जावान् बन पड़ी हैं। ब्रजभाषा पर तो आपका अपूर्व अधिकार है। कहीं-कहीं मुहावरों एवं लोकोक्तियों के प्रयोग में भाषा की अभिवृद्धि में चार चाँद लगाते हैं। उपमान जीवन से ग्रहीत हैं। कविता के साथ गद्य में कवि के विचार उसे समझने में सहायक तो हैं ही, साथ ही कवि का ये नवीन प्रयोग प्रशंसनीय है। लेखक की विद्वत्ता का भी कहीं अंत नहीं है। जापानी विधा हाइकू में निबद्ध त्रिपदीय रचनाओं की परत दर परत सींवन उधेड़ी है। स्वध्येय में वे अनवरत सृजन की ओर संकेत भी करते हैं।
प्रमुख वक्ता आचार्य ब्रजमोहन मधुर ने ‘सहितस्य भाव: साहित्य’ की अवधारणा को पूरा करने वाले साहित्यकार के रूप में आकुल को साधुवाद दिया। लोक साहित्‍य, लोक संस्कृति को बचाये जाने के उनके आग्रह को भी उन्होंने साधुवाद दिया और कृति को अध्यात्म और दर्शन की एक उत्कृष्ट कृति के रूप में बताया। डॉ0 अशोक मेहता ने पुस्तक को आस्था के कवि की अनुगूँज के रूप में सार्थक प्रयत्न बताया। उनकी दृष्टि में शृंगार और होली विषयक रचनाओं को वे सुंदरतम बताते हैं। मुख्य अतथि श्री रघुराज सिंह हाड़ा ने अपने वक्तव्य में ‘आकुल’ को आशीर्वाद देते हुए कहा कि सर्वप्रथम मैं पत्थरों के शहर के उनके एक शेर को सूक्ति के रूप में देखता हूँ ‘दोस्त फ़रिश्ते होते हैं, बाक़ी सब रिश्ते होते हैं’ जिसे मैं पचासों मित्रों को सुना चुका हूँ। उन्होंने बताया कि जीवन की गूँज को मैंने आद्योपान्त पढ़ा है। जिस पुस्तक का आरंभ श्रीकृष्‍णार्पणम् से हुआ हो और समाप्ति श्रीकृष्णार्पणमस्तु करके बात पूरी हुई हो, तो भई श्रीकृष्णार्पणम् के बाद तो लोकार्पण, प्रसाद वितरण का ही होता है और वो भी हो गया। मेरे लिए यह सुखद बात मानता हूँ, जिस समय प्रिय आकुल का जन्म हुआ 18 जून 1955, उसके कुछ दिन बाद ही मैं शिक्षक बन गया था। दो तीन महीने पहले जन्मा बालक आज इतनी प्रोढ़ता के साथ एक कृति प्रस्तु्त करे और वह भी ऐसी, जो सारे जीवन को गूँजता हुए क्रमश:-क्रमश: चरेवेति-चरेवेति भाषा में कह जाता है। मुझे सबसे अच्छी बात इस कृति की यह लगी, वो यह कि सामान्यतया होता यह है कि मन किया और लिख दिया, पर प्रिय आकुल का संजीदगी भरा, धैर्य और उनकी प्रज्ञा का आग्रह रहा होगा कि उन्होंने कृति लिखने से पूर्व ‘क्या लिखूँ, क्यों लिखूँ’ के उत्तर तलाश किये, इसलिए हर रचना के पूर्व उन्होंने अपने उद्रगार प्रकट किये हैं। सामान्यतया ऐसा होता नहीं है, पर आकुल ने यह कर दिखाया, जो प्रशंसनीय है। यह सभी रचनाकारों के लिए सोचने की बात है। उन्होंने 'यदा यदा हि धर्मस्य' पर विवेचना की और आकुल को सुंदर कृति के लिए आशीर्वाद दिया।
अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ0 औंकारनाथ चतुर्वेदी ने कहा कि 19 वीं शताब्दी में झालावाड़ ने शीर्ष स्थान प्राप्त किया था, हिन्दी सेवा में। हरिवंश राय बच्चन जहाँ गिरधर शर्मा कविरत्‍न से मधुशाला के छंद सीखने आये थे, जिस कविरत्‍न गिरधर शर्मा, शकुंतला रेणु, भट्ट गिरधारी शर्मा तैलंग कवि किंकर की कर्मभूमि झालवाड़ रही हो, पं0 गदाधर भट्ट का परिवार हो, ऐसे परिवार से संस्कारित हैं रत्‍नशिरोमणि “आकुल”। जीवन की जो गूँज है, एक सार्थक कवि की सार्थक प्रतिध्वनि है, जो दशकों तक लोगों द्वारा याद की जायेगी। मैंने पूरी पुस्तक को पढ़ा है। आज जन्माष्टमी है, चौंकिये मत, भले जन्माष्टमी आठ दिन बाद है। पर आज जन्माष्टमी है। हर रचनाकार की कृति का लोकार्पण जन्माष्टमी का त्योहार ही तो होता है। जो रचनाकार हैं, साहित्यकार हैं, जिसने अपने जीवन में पुस्तक लिखी हो, तन मन की सुध बिसरा जाता है। भाई आकुल ने कितने सपने सँजोये होंगे। अपनी आजीविका से पेट काट कर पैसे इकट्ठे कर के पुस्तक छपवाई होगी। एक संगीतकार का जीवन जीते जीते कवि बन जाना, अपने जीवन का इतना बड़ा मोड़ ले आना, फिर अपनी अंतर्भावानाओं से गुँथ जाना, फि‍र अपने आराध्य को ढूँढ़ना, फि‍र आराध्य के साथ अनुरंजित हो जाना, बहुत बड़ी साधना है। उन्होंने श्री भट्ट को सफल कृति के लिए शुभकामनायें दीं। उन्होंने आज वृद्धावस्था में बड़ी सक्रियता के लिए रघुनाथ मिश्र को भी बधाई दी।
कवि आकुल ने भी अपने स्व-भाव में पुस्तक लिखने की प्रेरणा के लिए थोड़े शब्दों में अतिथियों को सम्बोधित किया। उन्होंने सम्पूर्ण जीवन जन कल्‍याण के लिए समर्पित करने वाले जननायक के रूप में कृष्ण के जीवन चरित से प्रेरित हो कर लेखन का अपना कर्तव्य निभाया है। उन्होंने कहा कि लोकोपयोगी साहित्य में वर्णन नहीं मिलने के कारण द्वारिका के जलमग्न होने और कृष्ण के निर्वाण की घटनाओं का छंदात्मक वर्णन उन्होंने ‘एक और महाभारत’ में किया है। मित्रता के प्रति समर्पित और उसके लिए प्रबल समर्थन ने ‘सखा बत्तीसी’ का निर्माण करवाया। संस्कार और पत्‍नी ‘श्री’ के महत्व ने जीवन को शृंगारित करने हेतु 'गीत गोविंद' को लोग भूले नहीं उसी तर्ज पर ‘शृंगार सजनी’ का सृजन किया है। उन्होंने इस पुस्तक को अपना स्वाध्याय बताया ओर कहा कि लोक संस्कृति और लोक साहित्य जीवंत रहे, यह कृति पाठकों को पसंद आयेगी। उन्होंने महाकाव्य महाभारत को प्रत्येक रचनाकार को पढ़कर आत्मसात् करने के लिए प्रेरित किया।
भारी संख्या में वरिष्ठ साहित्यकारों सहित अनेक रचनाकारों ने समारोह में भाग लिया। वल्ल्भ महाजन, सुरेश चंद्र सर्वहारा, डॉ0योगेन्द्र मणि कौशिक, महेंद्र नेह, डॉ0 इंद्र बिहारी सक्सैना, सावित्री व्यास, हरिश्चंद्र व्यास, डॉ0 नलिन, डॉ0 फ़रीदी, डॉ0 राधेश्याम मेहर, शरद तैलंग, समाचार सफ़र के सम्पादक जीनगर दुर्गाशंकर गहलोत, अखिलेश अंजुम, आलोचक प्रोफेसर हितेश व्यास, भगवती प्रसाद गौतम, बृजेंद्र सिंह झाला पुखराज, रामदयाल मेहरा, हलीम आईना, बाल कृष्ण निर्मोही, बद्री लाल दिव्य, क्ष्मा मिश्रा, उपासना मिश्रा, बालकवियत्री पूर्वी मिश्रा, गोविन्द शर्मा, वेद प्रकाश परकाश, पीयूष भट्ट, आदि अनेकों साहित्य प्रेमियों ने समारोह में उपस्थिति दी। कार्यक्रम के अंत में अल्पाहार और लेखक की कृति का वितरण किया गया। जलेस सचिव, चर्चित होती त्रैमासिक पत्रिका दृष्टिकोण के प्रकाशक और फ्रेंड्स हेल्पलाइन के संरक्षक श्री नरेंद्र चक्रवर्ती ने पधारे सभी महानुभावों का आभार प्रकट किया।

1 टिप्पणी:

  1. Hearty contratulations ! I could not come to book release function as I had gone to Delhi. As I see from the reports and photographs, it was a worthy occasion. I wish you many more creative occasions like this. Carry on. Perhaps we could meet soon and talk about things literary. - Arun Sedwal

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