28 फ़रवरी 2017

यार का ग़म

गीतिका 
पदांत- है
समांत- अलता है 

यार का ग़म, कम करने में, वक्‍त भी छलता है.
यार से मिलने, को यह’ मन, कमबख्‍त मचलता है.

आज लगा उसके बिन, उससे दिल का रिश्‍ता था,
दिन रातों की तनहाई में, इक डर पलता है.

यार बिछड़ जाये तो, जब-तब, ढलते हैं आँसू,
लाख करें कोशिश, मुश्किल से, हर दिन ढलता है.

अब तो तनहाई भी रास नहीं आती हमको,
तनहाई में यह दिल बेर्इमान पिघलता है.

कैसे कह दूँ, उसने वफा में, दग़ा दिया ‘आकुल’,
यह वो शय है, जहाँ किसी का, बस नहीं’, चलता है.  

2 टिप्‍पणियां:

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