
लोक गीत देहाती हैं सब, आल्हा राग बसंत।।
हरसायेगी पवन बसंती सरदी का अब अंत।
सूरज ने भी बदला है पथ साक्ष्य मकर सकरंत।
कहीं पतंगें उड़ें कहीं पर सरसों बीच पतंग।
रंग बिरंगे कपड़े पहनें सब करके अभ्यंग।
होली के रंगों में गायेंगे अब फाग बसंत।।
गजक, रेवड़ी, तिल-पपड़ी अब देंगी नहीं दिखाई।
नहीं दिखेंगे कल परसौं से स्वेटर, कोट, रजाई।
कल खेली थी सूरज से हमने आँख मिचौली।
अब छाया की बाथ भरेंगे धूप लगेगी गोली।
वन-उपवन-कानन फैलेगी सुरभित प्रीत अनंत।।
धर्म और संस्कृति का अपना इक दर्शन है न्यारा।
उत्सव,पर्व,त्योहार मिलन का दिग्दर्शन है प्यारा।
प्रीत सिखाता यही देश है रीत सिखाती धरती।
गंगा जमुना की झारी माँ की आँखों से झरती।
सार्थक तभी बसन्त द्वेष कटुता का हो बस अंत।।

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