
(गीतिका)
मेरी
जीवन नैया भी अब डग-मग बहती रहती है.
श्वास
लहर लहरों सेे भी अब लगभग डरती रहती है.
जब
जब आए ज्वार किनारे पर सहमी सी डरी हुई,
तंग
थपेड़ों को हरदम अब डग-डग सहती रहती है.
जब
भी रहते मेरे सँग मेरे संगी साथी दिन भर,
यादों के सँग आँँखें भी अब डब-डब बहती रहती है
कभी
नहीं था ऐतराज मुझको जाने अनजानों से,
केवट आँँखें दुनिया के अब रँग-ढँग पढ़ती रहती है
मोह
माया महत्वाकांक्षाएँ नहीं छूटतीं जीवनभर,
रोज
बहाने नाम धाम अब पल-पल धरती रहती है
बचपन और जवानी तो यूँ निकल गए गिरते पड़ते,
गिरूँ-पड़ूँ
नहीं शेष उमर अब जब-तब कहती रहती है.
अब भी बीच सफर में जब तूफानों के तेवर देखूँ,
आशंकाएँ ‘आकुल’ की अब धक-धक बढ़ती रहती है.
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