18 फ़रवरी 2022

काक महिमा - 2 (दोहे)

1

कोयल का घर फोड़ कर, घर घर ढूँढ़े प्रीत । 

अब तक तो कोई नहीं, मिला काक को मीत ।।

2

बड़ बड़ बातें बोल कर, काक घटाते मान ।

चाहे चतुर सुजान हैं, नहीं मिले सम्‍मान ।।

3

दशाह घाट श्‍मशान या, श्राद्ध पक्ष में श्रेय ।।

मिले काकश्री को सदा, समझो उसे न हेय ।

4

काक चेष्‍टा भले ही, जग में हुई बखान ।

भूला जग अब तक नहीं, सीता का अपमान ।।

5

गो-ब्राह्मण बिन कनागत, दशा(ह) घाट बिन काक ।

सद्गति बिन उत्‍तर करम, जीवन ना बिन नाक ।।

6

कागा महिमा जान लो, पंडित काकभुशुंड ।

पर जयंत को भी मिला, एक आँख का दंड ।।

7

कागा की परिवार से, कभी न देखी प्रीति ।

औघड़ सा घूमे सदा, कौन सिखाए रीति ।।

8

कोयल बुलबुल कब लड़ें, करें न अतिक्रम, क्‍लेश ।

कागा का भी घर बसे, हो यदि चेष्‍टा लेश ।।    

9

मादा कागा दुखी है, कागा की मति देख,

नहीं चाह कर संग में, रहे भाग्‍य के लेख ।।

10

कहीं न क्‍यों पिक जा छिपे, लेता काक निकाल।

ऐयारी में काक की, कोई नहीं मिसाल ।

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