21 जून 2018

तन मन स्‍वस्‍थ रहें सबके, ऐसा जीवन हो. (गीतिका)

छंद- लीला (14,10 पर यति अंत सगण (112) से
पदांत- ऐसा जीवन हो
समांत- अके (अकारांत)

तन मन स्‍वस्‍थ रहें सबके, ऐसा जीवन हो.
योग करें सब नित तड़के, ऐसा जीवन हो.

दिनचर्या भी हो ऐसी,  जन सौहार्द बढ़े,
सहयोग करें बढ़-बढ़ के, ऐसा जीवन हो.

तन तंदुरुस्‍त हों सबके, हौसले पंख बनें,
विजयी बनें शिखर चढ़के, ऐसा जीवन हो.

तकनीकी युग में पल पल, का मोल समझ लें,
परिणाम मिलें प्रति क्षण के, ऐसा जीवन हो.

अग्नि परीक्षा देनी हो,  पीछे क्‍यों हटना,
बदले की आग न भड़के, ऐसा जीवन हो.


18 जून 2018

मिला यह तन, पिता माता का ही प्रतिदान होता है (गीतिका)

छंद- विधाता
मापनी- 1222 1222 1222 1222
पदांत- होता है
समांत- आन
(पिता दिवस पर)
मिला यह तन, पिता-माता का’ ही, प्रतिदान होता है.
सभी परिवार में, हर एक की, पहचान होता है.

मिला है  नाम, दुनिया में बदौलत, उनके ही यारो,
पिता माता के’, गुणसूत्रों का’ वह, संज्ञान होता है.

पिता, माता का है सौभाग्‍य, घर का है, वो’ कुलभूषण,
धुरी परिवार, की होता पिता, अधिमान होता है

बिना माता-पिता के घर, नहीं होता, कभी भी घर,
बिना संतान, के भी घर सदा, सुनसान होता है.

प्रतिष्‍ठा मान अरु सम्‍मान, हासिल करना’, जीवन में
पिता-माता के, हर इक त्‍याग का, गुणगान होता है.     

पिता को है, कहा ग्रंथों ने', सौ गुरुओं से' बढ़ कर ही
इसी कारण, पिता इक रूप में, भगवान होता है.
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उपाध्यान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
सहस्त्रं तु पितृन माता गौरवेणातिरिच्यते।।

अर्थात, दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य’, सौ आचार्यों से बढ़कर पिताऔर 
एक हजार पिताओं से बढ़कर मातागौरव में अधिक है, यानी बड़ी है।

पिताके बारे में मनुस्मृति में तो यहां तक कहा गया है:
 ‘‘पिता मूर्ति: प्रजापतेः’’
अर्थात, पिता पालन करने से प्रजापति यानी राजा व ईश्वर का मूर्तिरूप है।
 

15 जून 2018

गोकुल सूना हो गया है (गीतिका)


कान्हा जब से' गये, गोकुल, सुनसान, हो गया है.
न जाने, है कौन, जिस पर, मेहरबान, हो गया है.

दिन रात, देखते हैं, पथ, कोई खबर न, आहट,
न जाने, किस घर, नगर में, मेहमान, हो गया है.

यादें हीतो, बची हैं अब, बिखरी, जहाँ-तहाँ पर,
मनमोहना, कहाँ तू, अंतर्धान, हो गया है.

दिन-रात, बीतते, हैं अब, स्मृतियों के’, खण्डहर में
वृंदावन भीअब तभी से, बियाबान, हो गया है.

मौसम के जैसे, वे दिन, आयेंगे, लौट के’, क्या,
भाता न, गीत है अब, अरण्यगान, हो गया है.

13 जून 2018

गर्मी में अब तो गरम होती है हर भोर ( गीतिका)

छंद- दोहा


गर्मी में अब तो गरम, होती है हर भोर.
रातों में लू की तरह, हवा मचाये शोर.

बीतें ले कर करवटें, अकुलाहट में नित्‍य,
रातें जगते ही कटें, जैसे जगते चोर .

सोच सोच कर है दुखी, फिर किसान इस बार,
भीषण गर्मी सी नहीं,  हो वर्षा घनघोर.

मौसम के लगते नहीं, हैं अच्‍छे आसार,
बेमौसम बरसात पर, चलता किसका जोर.

प्रकृति वल्‍लभा की दशा, देख सूर्य का तेज,
नीलगगन भी मौन है, व्‍याकुल धरा कठोर.

पवन झकोरा आएगा, गुजर जाए'गी रात,  
मौसम से टूटे नहीं, बस जीवन की डोर. 
 
चल ‘आकुल’ ऐसा करें, प्रकृति रहे खुशहाल,
कण-कण वसुधा का फले,  महके चारों ओर.