3 जुलाई 2015

मेरे घर आँगन में गौरैया नित आओ

मेरे घर आँगन में, गौरैया नित आओ।।

ढेर परिंडे बाँधे, कई नीड़ बनवाये।
विकसित किया सरोवर, कई पेड़ लगवाये।
खुशबू से महके घर, मेरा नंदन कानन,
जूही, चंपा कनेर, हरसिंगार लगाये।

आओ गौरी मैया, घर परिवार बसाओ।।

तुम जो रोज सवेरे, आकर गा जाती थींA
बिना घड़ी के ससमय, हमें जगा जाती थीं।  
कैसा रिश्‍ता था वह, कैसी परिपाटी थी,
समझे नहीं आज तक, जो समझा जाती थीं।
 
अब समझे हैं आओ, कुछ नवगीत सुनाओ।।


खा कर दाना चुग्गा, फुदको डाली डाली।
यहाँ नहीं आएगा, कोई हाली माली।
कोई फि‍क्र ना कोई, बंधन ना बहेलिया,
नीचे उपवन ऊपर, नील गगन की थाली।
 
जिस कोने में चाहो, अपना नीड़ बसाओ।।

तुम मानव की बस्‍ती, निकट रहो जन्‍मांतर।
विचरण करो सदा ना, बनो कभी यायावर।
गगन बहुत सूना है, प्रकृति है खोई खोई,
शुरूआत करनी है, तुमको यहाँ बसा कर।

सब पंखी आऐंगे, तुम भी प्रीत बढ़ाओ।।   

1 जुलाई 2015

राम से नेह लगाया कर

राम नाम संकीर्तन कर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू ,  तर जाएगा प्राणी।।

 भवसागर से भरा हलाहल, क्‍या बिसात है तेरी।
बिना पिये ना निकल सकेगा, क्‍या औकात है तेरी।
राम की नैया से ही पार, उतर पाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,------------------।।

धन्‍य है केवट की भक्ति, प्रभु राम के पैर धुलाए।
धन्‍य है शबरी की भक्ति, प्रभु राम को बेर खिलाए।
भज मन राम धन्‍य जीवन तू, कर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

राम भक्‍त हनुमान हुए हैं, अमर है जिनकी गाथा।
जिनके हृदय बिराजे राम, लखन और सीता माता।
हृदय बसा श्री राम जपा कर, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

घर भेदी ने लंका ढाई, ये दुनिया ने जाना।
रामराज्‍य आया घर घर वहाँ, क्‍या सबने ये जाना।
भक्‍त विभीषण सा बन जा तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

व़न-वन गाँव-गाँव घूमे, रघुवर ने अलख जगाई।
नर, नारी, पक्षी, पशु सबको, धर्म की राह बताई।
ऐसी भक्ति कर भवसागर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

मोह में प्राण गये दशरथ के, अहं से रावण हारा।
पत्‍थर बनी अहल्‍या तारी, बाली भी संहारा।
रोम-रोम श्रीराम बसेंगे, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर तू,-------------------।।

क्रोध, अहं, मोह बर्बरता ,से बल सु‍बुद्धि भरमाई।
शिवधुन उठा न अंगद पैर, न लंका ही बच पाई।
क्षणभंगुर सा जीवन पावन, कर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया कर-------------------।।

ऱाम नाम संकीर्तन कर तू, तर जाएगा प्राणी।
राम से नेह लगाया करतू, तर जाएगा प्राणी।। 

12 अक्तूबर 2014

कर्तव्‍य बोध


युवापीढ़ी को अच्‍छे और बुरे का भी हो बोध।
अपने दायित्‍वों और कर्तव्‍यों का भी हो बोध।
राष्‍ट्र विकास में जुड़ने के तब होंगे मार्ग प्रशस्‍त,
जब दृढ़ इच्‍छा-शक्ति व संकल्‍पों का भी हो बोध।

संस्‍कारों से करना होगा शुभारंभ अभिज्ञान।
निश्चित करने होंगे ध्‍येय, परिणाम और प्रतिमान।
कंटकीर्ण होंगे पथ, मौसम, समय कहाँ रुकते हैं,
सदा युगंधर पर करता है सारा जग अभिमान।

संभव है आगे बढ़ने में आएँगे अवरोध।
युवापीढ़ी को अच्‍छे और-------------------------

स्‍वच्‍छ धरा हो, निर्मल वायु, प्रदूषण मुक्‍त जहाँ हो
नंदनकानन हो पथ वृक्षाभूषण युक्‍त जहाँ हो
उपनिवेश आदर्श बनें, हो प्रजा प्रबुद्ध निष्‍णात,
प्रेम और सौहार्द बढ़ें, खर-दूषण मुक्‍त जहाँ हो।

सहज नहीं है सृजन प्रकृति के भी होंगे प्रतिरोध।
युवापीढ़ी को अच्‍छे और------------------

बीत रहा कल आज जिये जा रहे भ्रमित सा जीवन।
श्रमजीवी दल जिये जा रहे विस्‍थापित सा जीवन।
ग्राम आज भी ढाणी से हैं, कस्‍बे छोटे हलके,
शहरों में सब जिये जा रहे अभिशापित सा जीवन।

नये नये हों परिवर्तन और नये नये हों शोध। 
युवापीढ़ी को अच्‍छे और------------------

जीवन को जीने का इक उद्देश्‍य हो इक संकल्‍प।
राष्‍ट्र उन्‍नति को इक जुट हो ढूँढें एक प्रकल्‍प।
कर्माश्रयभृति ना जीवन, साहस हो सत्‍यंकार,
मातृभूमि पर न्‍योछावर अंतिम हो एक विकल्‍प।

बनना यदि कर्तव्‍य परायण सभ्‍य समर्थ प्रबोध।     
युवापीढ़ी को अच्‍छे और------------------ 

5 सितंबर 2014

शिक्षक दिवस पर रचना एवं हाल ही प्रकाशित शब्‍द प्रवाह वार्षिक काव्‍य विशेषांक 2014

शिक्षक दिवस पर मेरी कविता पढ़ें-




हाल ही में प्रकाशित श्री संदीप सृजन सम्‍पादित 'शब्‍द प्रवाह' वार्षिक काव्‍य विशेषांक 2014 को पढ़ें और उन्‍हें अपने विचार अवश्‍य प्रेषित करें-

3 सितंबर 2014

सबमें समाया है (नवगीत)

दिन ब दिन इक डर 
सब में समाया है।

किस मुँह से 
संस्‍कारों की बात करें
अपने ही जब 
अपनों पर घात करें
बढ़ती महँगाई, 
हर तरफ प्रदूषण
कौनसा व्रत, मौन, 
कैसा पर्यूषण
कैसी व्‍यवस्‍था 
सुविधाओं की बात
नियम कायदे कानून 
किताबी बात
अंगद पाँव 
अनिष्‍ट ने जमाया है।

शहरों में मशीनी 
जीवन हो गये 
गाँवों में ज़मीनी 
जीवन खो गये
पाणिग्रहण, यज्ञोपवीत 
जैसे जेल।
गुड्डे व गुड़ियाओं के 
जैसे खेल
सम्‍वेदनायें खोईं 
बढ़े स्‍वार्थ
भ्रम में ही रहेगा 
हर एक पार्थ
इस चलन से किसने 
क्‍या कमाया है

दिन ब दिन इक डर 
सब में समाया है।

1 सितंबर 2014

किससे क्‍या शिकवा (नवगीत)

किससे क्‍या है शिकवा
किसको क्‍या शाबाशी

नहीं कम हुए बढ़ते
दुष्‍कर्मों को पढ़ते
बेटे को माँ बापों पर
अहसाँ को गढ़ते
नेता तल्‍ख सवालों पर
बस हँसते-बचते
देख रहे गरीब-अमीर
की खाई बढ़ते
कितनी मन्‍नत माँगे
घूमें काबा काशी

फि‍र जाग्रति का
बिगुल बजेगा जाने कौन
फि‍र उन्‍नति का
सूर्य उगेगा जाने कौनछा
छाएगी कब घटा
घनेरी बरसेगा सुख,
फि‍र संस्‍कृति की
हवा बहेगी जाने कौन
स्‍वप्‍न नहीं यह
अभिलषा के कुसुमाकाशी।

छोड़ेंगे यदि 
संस्‍कार होंगे बेहतर कब
पालेंगे यदि 
बहिष्‍कार होगें कमतर कब
रिश्‍तों की गरमाहट को
लग गई नज़र कब
भूलेंगे यदि 
परिष्‍कार होंगे बरतर कब
कैसे बदले हवा
फूल कब हों पालाशी