16 जनवरी 2017

दो मुक्‍तक

1. मकर संक्रांति
देश काल अब नूतन करवट बदल रहा है.
सूर्य संक्रमण कर अपना पथ बदल रहा है.
आज एक मृत्‍युंजय का निर्वाण दिवस है,
भीष्‍म प्रतिज्ञा करें जीवन पथ बदल रहा है.



2. दान-पुण्‍य 
दान-पुण्‍य हो, दान-धर्म हो या हो जीवन धर्म.
रक्षा इसका कवच दयानिधि है जीवन का मर्म.
हर युग में है दान-पुण्‍य से बना मनुष्‍य महान्,
क्‍या दधीचि क्‍या कर्ण सभी का दान-पुण्‍य सत्‍कर्म.



10 जनवरी 2017

तीन मुक्‍तक

विश्‍व हिन्‍दी दिवस की शुभकामनाएँँ 

1
आजादी से पहले बिरतानिया में सूरज नहीं कभी अस्‍त होता था.
अत्‍याचार तब देश में भारतीयों पर दिनोंदिन जबरदस्‍त होता था.
काश हिंदी राष्‍ट्रभाषा तय हो जाती हर भारतीय तब देश के लिए,
हिन्‍दी हैं हम वतन है हिन्‍दोस्‍ताँँ हमारा, गाता और मस्‍त होता था.
2

आदमी आलस्‍य त्‍याग नई ऊर्जा भरते हैं जब सूर्य उदय होता है .
पंछी भी नई ऊर्जा ले परवाज भरते हैं जब सूर्य उदय होता है.
प्रकृति भी अपनी अनुपम छटाएँँ बिखेरती है ऊर्जा ले कर सूर्य से,
जीवन सारे इसी ऊर्जा से उम्र तय करते हैं, जब सूर्य उदय होता है.
3
भूल-चूक लेनी-देनी, व्‍यवहार चला ऐसे जब से.
दुनियादारी निभी और घर-बार पला ऐसे तब से.
इसीलिए जड़ जमी हुई युग युग से भ्रष्‍टाचारी की,
लेन-देन की दौलत से व्‍यापार फला ऐसे तब से.   

9 जनवरी 2017

अगर आप से दिल लगाया न होता

वाचिक भुजंग प्रयात 
मापनी -- 122 122 122 122

(गीतिका)
पदांत - न होता
समांत - आया

अगर आप से दिल लगाया न होता.
हमें जिंदगी ने सताया न होता.

मुलाकात हर इक शरारत हुई थी,
हमें काश यह सब बताया न होता.

बहुत दूर तक आ गये अब सफर में
हमें चाहतों से जताया न होता.

गुजारे नहीं दिन कभी गर्दिशों में
जहाँ ने हमेशा जिताया न होता.

अगर जानते पूजते न बुत बनाके
महल ताज जैसा बनाया न होता. 

6 जनवरी 2017

सुबह किया सलाम

नवगीत

कुहरे में दुबके सूरज को
सुबह किया सलाम.
बया झाँकती गोख से
झूला गीला ओस में
पंछी सारे दुबक रहे
आस-पास पड़ौस में
रजत कटोरे से सूरज को
सुबह किया सलाम.
देख विवश सूरज को खग
चहक रहे डेरे में
 विवश बाथ भरने को वे
गगन ढका कुहरे में
मोती ओस कणों वाली
सुबह को किया सलाम.
पैर रुक रहे ओस देख
पहने थे जो मोजे
लोग कह रहे ओस देख
सूरज के भी रोजे़
अलसभोर में जागे जग को
सुबह किया सलाम.

5 जनवरी 2017

जिंदगी ने कभी हार मानी नहीं

(गीतिका)

मापनी- 212  212  212  212 
समांत- आनी
पदांत’ नहीं
(अरुण छंद)

जिंदगी ने कभी हार मानी नहीं
मौत ने की कभी महरबानी नहीं

मौत ने ठहर के जिंदगी को सुना
आदमी ने कभी बात मानी नहीं

वक्‍त ने खूब उसको दिये तोहफे
मात्र बचपन बुढ़ापा जवानी नहीं

वह गुरूर न करे काश जीते हुए  
हौसलों से कभी छेड़खानी नहीं

जिंदगी में करोगे वही है अमर  
मौत जिस्‍मानी’ दी है रू’हानी नहीं.

4 जनवरी 2017

तीन मुक्‍तक

1 (चित्राभिव्‍यक्ति)
चिडि़यों ने सीखा है जैसे पढ़ कर गाना गाना
देख चकित हैं जैसे यह सब, है जाना पहचाना.
चूँ-चूँ करती फुदक-फुदक कर, गौरैया गाती है,
आओ सखियो सीखें नये साल में नया तराना. 
2
समय अनुकूल हो, सफलता के आसार बढ़ जाते हैं.
अपनों से दूरियाँ, गैरों के व्यवहार बढ़ जाते हैं.
सफलता का नशा भी कुछ ऐसा ही है जैसे 'आकुल',
चाँद को बढ़ता देख समंदर में ज्वार बढ़ जाते हैं.
3
समय प्रतिकूल हो तो, जहाँ में कुदरत भी बदल जाती है
गैरों को क्‍या दोष अपनों की फितरत भी बदल जाती है
कहते हैं समय मौसम की तरह आता-जाता है आकुल,
समय घाव भरता है, समय पर किस्‍मत भी बदल जाती है


2 जनवरी 2017

यह पथ है नववर्ष का

video
(दोहा गीतिका)

यह पथ है नववर्ष का, जुट जाओ नि:स्वार्थ 
जीवन पथ उत्कर्ष का, करने को पुरुषार्थ.

राग द्वेष सब भूल कर, संग मित्र परिवार,
कर गुजरो कुछ अनछुआ, बिन कोई हितस्वार्थ.

सब अपने सँग हैं तभी, है वसुधैवकुटुम्ब,
कुछ ऐसा कर जाइये, हो हर' कृत्य कृतार्थ.

अकर्मण्य को भी लिए, संग रखें यह सोच, 
होगा कुछ भवितव्य ही, उसका कोई स्वार्थ.

रामायण से सीखिए, मर्यादा की सीख, 
महासमर का पर्व हर, कर्म प्रवण निहितार्थ.

वेद पुराणों की धरा, गंगा यमुना तीर, 
सभी धर्म समभाव को, करते हैं चरितार्थ.

श्रीकृष्णशरणं मम भज, रे मानव दिड्.मूढ़, 
जीवन को तू धन्य कर, चल पथ पर सत्यार्थ.

यह वह भारत भूमि है, गीता जहाँ वरेण्य, 
है प्रधान बस कर्म ही, सीखा है जब पार्थ.

हर युग में बस कर्म से, जीता है विश्वास. 
अवतारों ने भी लिया, जन्म हेतु परमार्थ.

कर दें स्‍थापित सभी, जीवन मूल्य सधर्म, 
कर्मों से बन जाइये, वर्द्धमान, सिद्धार्थ.