16 नवंबर 2017

बस वफ़ा सीख ले (गीतिका)



छंद- गंगोदक
मापनी- 212 x 8
पदांत- सीख ले
समांत- अफ़ा

ज़ि‍दगी से भी’ थोड़ा तू’ मिलना कभी
ज़ि‍दगी है न होती खफ़ा सीख ले.
ज़ि‍दगी में हँसाओ हँसो ख़ुद सदा
ज़ि‍दगी में यही फ़लसफ़ा सीख ले.

जानवर भी हैं’ हँसते जताते नहीं
उन को’ परवा नहीं कोई’ देखे उन्‍हें
चल तू’ राहें सदा अपनी’ मस्‍ती में’ बस
कैसे’ करते हैं’ ग़म को सफ़ा सीख ले. 

चाँद नित सूरतें है बदलता रहे
चाँदनी फिर भी’ रोशन करे आसमाँ
चाँद का आसरा फिर भी’ है चाँदनी
ज़ि‍दगी है यही हर दफ़ा सीख ले.

मत रखे मैल मन में किसी के लिए
आज तू है दुखी कल था’ वह भी दुखी
दिन नहीं एक जैसे कभी भी रहें,
सब के हिस्‍से है’ सुख बस वफ़ा सीख ले.

कौन है ज़ि‍दगी में हुआ है अमर
नाम रहता है’ ये चाम रहता नहीं
कर तू’ ऐसा सफ़र ज़ि‍दगी का कटे
हो बराबर का’ नुकसाँ-नफ़ा सीख ले.

15 नवंबर 2017

तुमने हे प्रलयंकारी (गीतिका)



छंद- ताटंक
मात्रा भार- 30. (चौपाई+14) अंत 3 गुरु (वाचिक) से 
               अनिवार्य.
पदांत- था
समांत- आया


(केदारनाथ त्रासदी)

तुमने हे प्रलयंकारी वह, रूप कराल दिखाया था.
तुमने हे केदारनाथ तब, जो विध्‍वंस मचाया था.

तोड़ बंधनों को गंगा ने, क्रोध जताया था उस दिन,
तुमने हे त्रिनेत्रधारी जो, रौद्र रूप दरसाया था.

मानव का था अहंकार यह थी मानव की हठधर्मी,
तुमने ही हे उमानाथ यह, हमको भान कराया था.

जीवन में बस हो न प्रदूषण, स्‍वर्ग धरा बन जाएगी,
तुमने हे त्रिदेव भयहारी, यह कर सिद्ध बताया था.

बस विनाश के सिवा न ‘आकुल’, पाएगा कुछ भी मानव,
तुमने हे कल्‍याण सदाशिव, मानव को समझाया था.

14 नवंबर 2017

हर दिल में बसता हो भारत.... (गीत)



छंद- लावणी 
मात्रा भार- 30 (चौपाई+ 14), 16,14 पर यति, अंत गुरु (वाचिक) अनिवार्य.
पदांत-रहे 
समांत- आन 

उन्नत भाल हिमालय सुरसरि, गंगा इसकी आन रहे.
हर दिल में बसता हो भारत, ऐसा हिन्दुस्तान रहे.


सम्‍प्रभुता का चिह्न तिरंगा,
स्वाभिमान हम करें सभी,
प्रेम और सद्भाव बढ़े अब
आत्मज्ञान हम करें सभी.
चक्र सुदर्शन सा लहराये, करता यह गुणगान रहे.
हर दिल में बसता हो भारत........................’’

वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता,
रामायण से ग्रंथ बड़े
वंदेमातरं जन-गण-मन हैं
राष्ट्रगान औ गीत बड़े
न्याय और आतिथ्य सदा ही, भारत के परिधान रहे.
हर दिल में बसता हो भारत........................’’

शून्य, ध्यान, संगीत, योग हैं,
बने धरोहर आज सभी,
राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध हैं
बने युगंधर राज कभी
अवतारों ने जन्म लिया वे, कहलाते भगवान रहे.
हर दिल में बसता हो भारत........................’’

अपने भारत को आकुलसब,
शत-शत बार प्रणाम करो,
दिन दूनी और रात चौगुनी
ख्याति बढ़े वह काम करो.
है अजेय अद्वितिय, अनूठा, भारतवर्ष महान् रहे.
हर दिल में बसता हो भारत........................’’

11 नवंबर 2017

देहली में लाेग जहरीली हवा में जी रहे (2 मुक्‍तक)

1
देहली में लोग जहरीली हवा में जी रहे.
राजधानी में ही' जीवन जिस दशा में जी रहे.
मान लीजे दिल ही' जब बीमार है इस देश का,
जान लीजे हर शहर किस दुर्दशा में जी रहे.
2
इक शहर जन्नत था मेरा, इक शहर था दिल मेरा.
जानते हैं सब कि अपना, है कोई क़ातिल मेरा.
विष हवाओं में फैला, लगने लगी है जंग भी,
लाओ मणि पारस न तन, हो जाय नाक़ाबिल मेरा.

10 नवंबर 2017

दर्प मत कर (गीतिका)


छंद- पीयूष वर्ष
मापनी- 2122 2122 212 (अंत गुरु से, वाचिक नहीं)
पदांत- सदा
समांत- आरा

दर्प मत कर दर्प ने मारा सदा.
दर्प से इंसान है हारा सदा.

जुर्म मत कर जुर्म तो बेअंत है,
जुर्म से इंसान नाकारा सदा.

गर्ज मत कर गर्ज ने लूटे सभी,
गर्ज से इंसान बेचारा सदा.

कर्ज मत कर कर्ज तो इक मर्ज है 
कर्ज से इंसान आवारा सदा.

शर्म मत कर शर्म कैसी कर्म में, 
कर्म से  इंसान है प्‍यारा सदा.

9 नवंबर 2017

मन बनाना सीख ले (गीतिका)


आधार छंद- मालिनी
मापनी- 2122 212
पदांत- सीख ले
समांत- आना

मन बनाना सीख ले
तन तपाना सीख ले

साहसी बन जाये' तो
धन कमाना सीख ले.

आपदाओं में सदा,
मुसकराना सीख ले.

कर बचत कम खर्च कर,
सुख बढ़ाना सीख ले.

साथ रख परिवार को
घर चलाना सीख ले.

बोझ मत रिश्‍ते समझ,   
बस निभाना सीख ले.

जिंदगी में गीत हो,
इक तराना सीख ले.