22 जनवरी 2018

फूलों ने संदेश दिया है (गीतिका)



छंद- गगनांगना छंद
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 25. 16, 9 पर यति, चरणांत 212.
पदांत- गया
समांत-

फूलों ने संदेश दिया है, बसंत आ गया.
हर पथ गाँव शहर गलियों में, बसंत छा गया.

धूप न भाये, हवा सुहाये, तँग न करे शरद,
अब स्‍वच्‍छंद प्रकृति में घूमें, बसंत भा गया.

स्‍वच्‍छ बनायें घर आँगन पथ, गाँव शहर सभी,
सौरभ पवन आ राग बहार , बसंत गा गया.

देख भ्रष्‍ट, दुष्‍कर्म, न्‍याय पर, जन जन नाद से,
जगी चेतना नई संतुष्टि, बसंत पा गया.

विश्‍व खड़ा आतंकवाद पर,  प्रश्‍न कई लिए,
आतंकवाद कई’ देशों का, बसंत खा गया.   

21 जनवरी 2018

स्‍वच्‍छ भारत की हवा को क्‍या कहोगे (गीतिका)

छंद- पियूष निर्झर
मापनी- 2122 2122 2122
पदांत- क्‍या कहोगे
समांत- ओ 

वक्‍त पे सँभले नहीं जो क्‍या कहोगे
आँख बदले हर दफा वो क्‍यो कहोगे.

मन हमारा क्‍यों न वश में आज तक भी,
देख मचले चीज हर तो क्‍या कहोगे

खर्च ज्‍यादा आय कम हैं खर्च फिर भी,
कर रहा है आदमी लो क्‍या कहोगे?

आदमी इंसान में है फर्क कितना
सभ्‍य इक, दूजा बताओ क्‍या कहोगे?

मौन है धरती प्रकृति सहती प्रदूषण, 
मौन ही मानव रहा सो क्‍या कहोगे?

भूल बैठा है पसीना, श्रम सभी जो, 
बीच चौराहे खड़ा हो क्‍या कहोगे?

कोशिशें जब तक न होंगी आँधियों सी,
स्‍वच्‍छ भारत की हवा को क्‍या कहोगे?

20 जनवरी 2018

क्‍यों लगता है हम मिले हैं (गीतिका)

आधार छंद- सरसी 
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 28. 16,12 पर यति, अंत 2 गुरु वाचिक 
पदांत- से 
समांत- अम
 
क्‍यों लगता है कि हम मिले हैं, आप से आप हम से.  
क्‍यों लगता है पास हो क़दम, जब जाते हैं थम से.

दूरियाँ वही, न देख कर भी, लगा तुम्‍हें है देखा, 
इस आभासी-दुनिया की भी, क्‍या बात है क़सम से.

चाँद सूरज चलते हैं सदा, लगता है क्‍यों ऐसा,
इस सच से कि चलती है धरा, न निकल पाए भ्रम से.

लगता ही तो है मिलते हैं, क्षितिज पर धरती गगन,
क्‍या हो पाएगा मिलन कभी,  कैसे लिखूँ क़लम से.

तभी तो जुड़े हैं ‘आकुल’ सभी, दुनिया से आभासी,
होता है आभास बचे हैं, शायद किसी सितम से.



18 जनवरी 2018

क्‍या कहोगे (गीतिका)

छंद- पियूष निर्झर
मापनी- 2122 2122 2122
पदांत- क्‍या कहोगे
समांत- अले 

देख कर भी जो न सँभले क्‍या कहोगे?
आँख वह हर बार बदले क्‍या कहोगे?

मन हमारा क्‍यों न वश में आज तक भी,
देख कर हर चीज मचले क्‍या कहोगे?

खर्च ज्‍यादा आय कम हैं खर्च फिर भी,
कर रहा, आदत न बदले क्‍या कहोगे?

आदमी इंसान में अब फर्क करना,
व्‍यर्थ, चर्चायें व मसले क्‍या कहोगे?

मौन है धरती प्रकृति सहती प्रदूषण,
मौन है मानव न सुध ले क्‍या कहोगे?

भूल बैठे हैं पसीना, श्रम सभी हम,
बीच चौराहे में फिसले क्‍या कहोगे?

कोशिशें होती नहीं हैं आँधियों सी,
हो रहे हैं पार हमले क्‍या कहोगे?

17 जनवरी 2018

सब को अमृतकलश मिले (गीतिका)


छंद- राधिका, 
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 22. 13, 9 पर यति अंत 2 गुरु
पदांत- है
समांत-  अना

सब को अमृतकलश मिले, यह चाहना है.
लक्ष्‍मण रेखा कष्‍ट की, अब लाँघना है.

कामना है यही बूँद, दो मिलें चाहे.
फिर भी भवितव्‍य उसका, ही’ सँवारना है.

बना न सका वामांगी, अर्द्धांगिनी जो,
आदमी जिसने सदैव, दी ताड़ना है.

हमने तो बाँटी सदा, अमृत की बूँदें,
उसकी भ्रष्‍ट करने की, क्‍यों भावना है.

जन्‍म देना ही होगा, नव पीढ़ि‍यों को,
शायद हो अवतार अब, संभावना है.