23 सितंबर 2018

बना मन ऐसा इक संसार (गीतिका)


छंद- शृंगार  
विधान- आदि त्रिकल(12/21)-द्विकल(11/2),
अंत त्रिकल (21 अनिवार्य)
समांत/तुकांत- आर.

बना मन, ऐसा इक, संसार.
बस रहे सिर्फ प्यार ही प्यार.

हृदय में, रात दिन, हो उमंग,
बीत जायें, यूँ ही, दिन चार.

झूठ से, न नर्क, बनता स्वर्ग,
सत्य जीवन, का हो, आधार.

प्यार में न हो, छद्म, छल और,
कभी भी, कहीं नहीं व्यापार.

हो न, मतभेद और मनभेद,
भेदना, मन हो, कर मनुहार.

21 सितंबर 2018

जी जीवन तू जैसे जीते थे अवतार (आकुल)


छंद- निश्‍चल
विधान- मात्रा भार- 23. 16, 7 पर यति, अंत 21 से.
समांत/तुकांत- आर.


कुछ भी करने से पहले कर, सोच विचार.
इच्‍छा शक्ति प्रबल कर फिर दे, उसको धार.

यश-अपयश के भी आसार हैं’, बनते क्‍योंकि,  
संस्‍कारों से ही तो निभते, हैं व्‍यवहार.

लाभ-हानि के, ऊँच-नीच के, होते दौर,
श्रेष्‍ठ आदमी वह जो सबसे, पाता पार.

धर्म तुला पर तोल अटल है, जीवन-मृत्‍यु,
जो है धर्म वही कर बाकी, सब बेकार.

स्‍वाभिमान भी बना रहे हो, न्‍याय सदैव,
जी जीवन तू जैसे जीते, थे अवतार.    

20 सितंबर 2018

जहाँ हो पुस्‍तकें ईश्‍वर वहाँ पर है (गीतिका)


छंद- सिंधु
मापनी- 1222 1222 1222
पदांत- वहाँ पर है
समांत- अर
 
जहाँ हो पुस्तकें ईश्वर वहाँ पर है.
जहाँ विश्वास है आदर वहाँ पर है.

युगों से बच रहे संस्कार इस कारण,
धरोहर पुस्तकों का घर वहाँ पर हैं.

भले चुप हैं भले हैं बंद पुस्तों में,
मगर इक शांत सा सागर वहाँ पर है.

तुझे मिल जायेगा हल हर समस्या का,
लिखा मिल जायेगा उत्तर वहाँ पर है.

जहाँ अच्छा लगे रुकना, तुझे ‘आकुल’,
समझ ले तू कि परमेश्वर वहाँ पर है.

17 सितंबर 2018

मैं तितली कहलाऊँ (गीतिका)


छंद सार. विधान 16, 12 पर यति, अंत 2 गुरु से.

मात-पिता की छाँव मिले मैं, तितली सी बन जाऊँ.
प्रेम, स्नेह की ठाँव मिले मैं, तितली सी इठलाऊँ.

पितु से प्रीति व संस्कारों से, बनूँ सुसंस्कृत माँ सी,
गुरु से ज्ञान मिले हर रँग में, तितली सी रँग जाऊँ.

बाबुल की बगिया में जैसे, मैं स्वच्छंदित घूमी,
वैसे ही मेरे घर में मैं, तितली सी रह पाऊँ.

कितनी ही ऊँची उड़ान हो, लौटूँ तो स्वागत हो,
स्वाभिमान से छूने को नभ, तितली सी उड़ जाऊँ.

यही है भरें कुलाँचे, मृगशावक जंगल में,
मृगमरीचिका में भी चंचल, मैं तितली कहलाऊँ.

12 सितंबर 2018

एक समय था (मुक्‍तक माला- 4)

1 
एक समय था सरकारी स्‍कूलों में, सभी पढ़ा करते थे
खेलकूद, पाठ्येतर गतिविधियों में, भाग लिया करते थे
शुल्‍क भी था मामूली, सर्वांगीण विकास हुआ करता था
सभी प्रशिक्षित शिक्षक सब छात्रों पर ध्‍यान दिया करते थे. 
2
एक समय था शिक्षा की गुणवत्‍ता थी इक अनुशासन था.  
परम्‍परा गुरु-शिष्‍य मुखर थी इक आदर्श पठन-पाठन था.
लेकिन आज राजनीति ने हर शिक्षा को पंगु बनाया,
सरस्‍वती लक्ष्‍मी का द्वंद्व हुआ जगजाहिर श्रुतिसाधन था 

एक समय था दिनचर्या भी, नियमित थी समयानुरूप थी.
खान-पान, व्‍यवहार व आदत, भी सदैव समयानुरूप थी.
आज जिंदगी, अस्‍त-व्‍यस्‍त है, भाग-दौड़, आपा-धापी से,
क्‍योंकि न अपनाई दिनचर्या, जिसने जो समयानुरूप थी. 
4
एक समय था, थे समाज संगठित, धाक थी, बड़े जनों की.
थे’ परिवार संयुक्‍त, नहीं चिंता, रहती थी, तब अपनों की.
अब परिवार, हुए छोटे हैं, चमक हुई, रिश्‍तों की फीकी,
भाते रिश्‍ते गै़र, चमक भाती जैसे, नकली गहनों की.  
5
एक समय था भिश्ती नाली, साफ़ किया करते थे हर दिन.
कचरा और गंदगी नियमित, साफ़ हुआ करती थी हर दिन.
आरक्षण का कहर भोगता, उथल-पुथल होता जन जीवन,
गाँव, शहर, पथ डूबा करते, हैं वर्षा ऋतु में अब हर दिन. 

6
एक समय था घर का स्‍वामी, ही घर का कर्त्ता-धर्ता था.
सब थे उसके तले सुरक्षित, निर्णय उसका ही चलता था
बदली है संस्‍कृति अब बच्‍चे-बहू बेटियाँ नहीं सुरक्षित,
मोबाइल बजते हैं आज जहाँ, उसका डंका बजता था. 
7
एक समय था, बिना मार्ग-दर्शन रहता था, ज्ञान अधूरा.
तय था शिक्षा-दीक्षा, रहन-सहन सब, जैसे कुश्‍ती नूरा. 
बदला समय, मचलते देखीं, जीवन में’ महत्‍वाकांक्षाएँ,
लगा भरा-पूरा बनने को, कम है यह जीवन भी पूरा.
नूरा कुश्‍ती- कुश्‍ती जिसमें निर्णय पहले से तय होता है. 
8
एक समय था, बच्चों में सहिष्‍णुता थी, उल्लास ख़ूब था.
शिक्षा की थी, एक व्यवस्था, खेल-कूद अरु हास ख़ूब था.
बढ़ी महत्वाकांक्षाएँ, आक्रोश बढ़ा है बच्‍चों में अब,
सपने तो, तब भी पूरे होते थे, वक़्त भी' पास ख़ूब था.
एक समय था, बहू घरों में, सास संग घूँघट लेती थी.
रंग-रूप, लावण्य, अंग अरु चंचलता सिमटी रहती थी.
सबसे पहले घोर बगावत, करी चाँद ने होगी जग में,
तभी चाँद तिल-तिल मरता था और चादनी चुप रहती थी.