14 अगस्त 2015

तिरंगा


तिरंगा, अपने देश की आन, बान और शान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
इसका वन्‍दन करते हैं हम सब भारतवासी, 
यह आज़ादी का परचम गणतन्‍त्र निशान है।
तिरंगा----------
सभी धर्म का मन्दिर, मस्जिद क्‍या गुरुद्वारे।
संत, विधायक, सांसद, नेतागण क्‍या सारे।
शीश झुकाते हैं इसको सब भारतवासी,
नीलगगन, कण-कण, धरती क्‍या  सभी सितारे।

यह ॠषि, मुनि, भरत भूमि का इक वरदान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
हरी भरी धरती हो रंग हरा कहता है।
सर्वधर्म समभाव है केसरिया कहता है।
मध्‍यचक्र शिक्षा देता है सजग रहें हम,
चलें शान्ति की राह श्‍वेत रंग यह कहता है।

अपनी कालजयी संस्‍कृति का यह गुणगान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
       तिरंगा---------- 
दशों दिशाएँ इसकी विरुदावली गाती है।
मलयानिल विन्‍ध्‍याचल हिमगिरि से आती है।
सुरभित पवन झकोरे सहलाते हैं परचम,
महिमा राष्‍ट्रीय पर्वों पर जनता गाती है।

अपना राष्‍ष्‍ट्रीय गान और राष्‍ट्रगीत यशगान है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
व़ीर शहीदों का यह ध्‍वज प्रतिदान है।
राष्‍ट्रीय चिह्नों मे यह प्रतीक प्रधान है।
यह अनमोल अतुल अक्षुण्‍ण है शिरो विभूषण,
यह भारत का उच्‍च शिखर सम्‍मान है।

राष्‍ट्रीय ध्‍वज से सुशोभित भारतवर्ष महान् है।
अपने गौरवशाली कल की इक पहचान है।
तिरंगा---------- 
तिरंगा, अपने देश की आन, बान और शान है। 

12 अगस्त 2015

मन के कहीं बसेरे होते


मन के कहीं बसेरे होते 
ना उड़ते बन के यायावर
नहीं होते अपनों से दूर।

गगन कुसुम की चाहत इतनी
दूर गगन भी छाँव से लगे।
राह भले ही आग धधकती।
प्‍यासे मरुधर गाँव से लगे।

धता बताते पलकों के दर 
चंचल मन के पाँव से लगे।
चंदा से अभिलाषायें ले 
और जिन्‍दगी दाँव सी लगे।

मन के कई न चेहरे होते
कहीं ढूँढ़ते चारागर क्‍यों
नहीं रहते अपनों से दूर।

दीवानापन खोता आया
चैन दिहाड़ी जैसा जीवनं।
धूल धमासा रोड़ी गिट्टी
खाली हाँड़ी जैसा जीवन।

साँस साँस की गति ताल में
फि‍र भी ताड़ी जैसा जीवन।
नशा भरे अपने पाँवों में
मन मारों का जैसा जीवन।

मन के कहीं अँधेरे होते
जाके छिपते तब ज्‍यादातर
कहीं रहते अपनों से दूर।

मन के कहीं बसेरे होते। 


11 अगस्त 2015

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ




चलो साथियो मिल के घर घर इक अभियान चलायें ।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

माँ की गोद हरी हो जब बेटी से सब कहते हैं।
लक्ष्‍मी सुख समृ‍द्धि ले कर आई है सब कहते हैं।
कुल कुटुम्‍ब का मान बढ़ाती इसका मान बढ़ायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

भेद भाव ना कभी करें बेटी-बेटे होने पर।
सभी बनेंगे घर बगिया के फूल बड़े होने पर।
मात-पिता ही भाग्‍य बनाते उनको ध्‍यान करायेंं
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।
बेटी से होती है हर रिश्‍ते की एक अहमियत।
बेटी से ही बहिन, बहू, माँ की इक अहम हैसियत।
बिन बेटी के इस सुख से घर है सुनसान बतायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

बिन बेटी के ना हो पाते घर में कई व्‍यवहार।
नहिं हो पाते राखी भैया दौज कई त्‍योहार।
घर की शोभा है बेटी बहिना यह ज्ञान करायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।
इसे बचाओ, इसे पढ़ाओ, बेटी को हर सुख दो।
है भविष्‍य की बागडोर इससे इसको ना दुख दो।
देगी वह आशीष बढ़ायेगी कुल परम्‍परायेंं।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

बेटी बाबुल का गहना ससुराल की शान शराफत।
दोनों घर की लाज निभाये, करती सदा हिफ़ाज़त।
बेटी है नारी शक्ति का प्रथम सोपान बतायें।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

चलो साथियो मिल के घर घर इक अभियान चलायें ।
बेटी घर का है उजियारा, यह संज्ञान करायें।

28 जुलाई 2015

सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: तैलंगकुलम् समाज का पाँचवा प्रतिभा सम्‍मान एवं लाइ...



सान्‍नि‍ध्‍य सेतु: तैलंगकुलम् समाज का पाँचवा प्रतिभा सम्‍मान एवं लाइ...: सामुदायिक समन्‍वय, सौहार्द एवं सौमनस्‍यता सम्‍मान, साहित्‍य निधि सम्‍मान, विशिष्‍ट कला- साधना सम्‍मान, रंग पथिक सम्‍मान और रामादेवी भट्ट स...

25 जुलाई 2015

आईने से क्‍या कोई झूठ बोल सकता है (ग़ज़ल)

आईने से क्‍या, कोई झूठ बोल सकता है।
बिना चाबी क्‍या, कोई कुफ़्ल1 खोल सकता है।
सच्‍चाई छिपती नहीं सात परदों में भी,
तराजू में क्‍या, कोई हवा तोल सकता है।
भलाई का सिला मिलता है सदा भलाई से,
समंदर में क्‍या, कोई ज़हर घोल सकता है।
हो जीने का अंदाज़, दुनियादारी की सिफ़त,
जिसके पास क्‍या, कोई दिल डोल सकता है।
दोस्‍त फ़रिश्‍ते होते हैं, बाक़ी सब रिश्‍ते होते हैं,
जो दोस्‍ती क्‍या, रिश्‍ते भी बना अनमोल सकता है।
‘आकुल’ आईने की मानो जो दोस्‍त भी है नहीं तो
किसी से भी क्‍या, कोई मन की बैठ बोल सकता है।


1. कुफ़्ल- ताला  

24 जुलाई 2015

18 जुलाई 2015

ग़ज़ल

रह जाते हैं ज़िंदगी में, अनसुलझे कुछ सवाल अकसर।
रह जाते हैं तिश्‍नगी1 में, अनबुझे कुछ सवाल अकसर।
मुसव्विर2 भी कभी-कभी मुत्‍मईन3 नहीं होते अपने फ़न से,
रह जाते हैं शर्मिंदगी में, अनकहे कुछ सवाल अकसर।
संगतराश4 की नज़र का सानी नहीं होता फि‍र भी,
रह जाते हैं तस्‍वीर में अनछुए कुछ कमाल अकसर।
दर्द की रौ में न बहे अश्आर5 वो ग़ज़ल ही क्‍या,
रह जाते हैं ग़ज़ल में न बयाँ किए कुछ मिसाल अकसर।
दस्‍ते शफ़क़त6 में चूक से नाशाइस्‍ता7 हुए हैं कई गुफ़्ल8,
रह जाते हैं गुलज़ार में गुल हुए कुछ हलाल अकसर।
किस्‍साकोताह9 कि मुहब्‍बत में फ़ना होते हैं परवाने ‘आकुल’,
रह जाते हैं तारीख़10 के सफ़्हों में उलझे कुछ सवाल अकसर।


1-तिश्‍नगी- प्‍यास 2- मुसव्विर- चित्रकार 3- मुत्‍मईन- संतुष्‍ट 4- संगतराश- शिल्‍पकार 5- अश्आर- शेर 6- दस्‍ते शफ़क़त- छत्रछाया 7- नाशाइस्‍ता- असफल  8- गुफ़्ल- अनुभवहीन व्‍यक्ति 9- किस्‍साकोताह- सारांश, किंबहुना 10- तारीख़- इतिहास।