19 अप्रैल 2018

जो खेले शतरंज जानता, हर इक चाल (गीतिका)

छंद- निश्‍चल
शिल्‍प विधान- 16,7 पर यति अंत 21 से अनिवार्य.
 
जो खेले शतरंज जानता, हर इक चाल.
बचता और बचाता है वह, अपनी खाल.

मोहरे चलें अपनी अपनी, चाल विशेष,
चौंसठ घर के इस बिसात का, खेल कमाल.

दो घोड़े, दो ऊँट, हस्ति दो, प्‍यादे अष्‍ट,
इक वजीर के संग नृपति की, करें सँभाल. 

हाथी सीधा आड़ा चलता, टेढ़ा ऊँट,
घोड़ा ढाई घर पर कूदे, करे धमाल.

संग त्रिदल करते आरोहण, युद्ध प्रवीण,   
अग्रपंक्ति में होते प्‍यादे, अष्‍ट कराल.

करे आक्रमण रण में पहली, पैदल पंक्ति,
आम आदमी का जीवन में, यह ही हाल.

लोकतंत्र भी है शतरंजी, एक स्‍वरूप,
मोहरे बनें आम आदमी, इसमें ढाल.

17 अप्रैल 2018

आरक्षण नासूर हुआ है (गीतिका)

छंद- रास
विधान- 16 (चौपाई)+6 पर यति. अंत 112 वाचिक
पदांत- हुआ है भारत में
समांत- ऊर

आरक्षण नासूर हुआ है, भारत में
जातिवाद मशहूर हुआ है, भारत में. 

सच्‍चाई है बाबा साहिब, का ‘आकुल’
सपना चकनाचूर हुआ है, भारत में.

सर्वधर्म समभाव पुन: कमजोर हुआ,
संविधान से दूर हुआ है, भारत में.

आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन, के बदले,
वोट बैंक मंजूर हुआ है, भारत में.

जातिवाद का हल्‍ला बोला, शंख बजा,
अपनापन काफूर हुआ है, भारत में.

16 अप्रैल 2018

हे! परमपिता, है यक्ष प्रश्न... (गीतिका)

छंद-द्विगुणित पदपादाकुलक (राधेश्यामी) चौपाई
पदांत- बता
समांत- आह
हे! राम-कृष्ण, हे! जगत्पिता, तू ही हम सबको राह बता.
रहते जो दहशत में कैसे, शांति से करें निर्वाह बता.

हैं लूट रहे भयमुक्त अभी, भारत को अपने लोग सभी,
सब अर्थव्यवस्था चौपट है, निर्धन का खैरख्व़ाह बता.

बेटी न सुरक्षित गर्भों में, कन्‍या भी' कई संदर्भों में,
मिलता कलंक जो छिपे नहीं, तब कैसे करें विवाह बता.

अब भ्रष्ट हुई हैं आस्थाएँ, बेबस हैं न्याय व्यवस्थाएँ.
इस भ्रष्टतंत्र पर अब तेरी, कब होगी वक्र निगाह बता.

आरक्षण, वर्ण-व्यवस्था अब, कब आएँगी पटरी पर अब,
हे! परमपिता, है यक्ष प्रश्न, हो जाये’ न देश तबाह बता.

14 अप्रैल 2018

बस! अबला का, नारी चोला अब त्‍यागे (गीतिका)

छंद- रास
शिल्‍प विधान- मात्रा भार 22. 8, 8, 6 पर यति अंत 22. 

बस ! अबला का, चोला नारी, अब त्‍यागे.
संहार करे, असुरों का वह, बढ़ आगे.

काली ने ज्‍यों, संहारा था, असुरों को,
पाप घटेगा, नारी जो अब, हर जागे.

बढ़ें कभी जब, अत्‍याचारी, दुष्‍कर्मी.
अस्‍त्र उठें तब, सीमाएँ जब, छल्‍लाँगे.

बेटे की दी बलि, वह वीरा, पन्‍ना थी,
लक्ष्‍मीबाई, जोधा जैसी, वह लागे.   

शृंगार नहीं है नारी का, जौहर अब,
दुश्‍मन को अब, रणचंडी सी, बन दागे.

देवों, वीरों, ने सीमा की, रक्षा की,
आदि शक्ति से, घर के दुश्‍मन, हैं भागे.

नारी तुमको, बनना है अब, नवदुर्गा,
नहीं बाँधना, है अब मन्‍नत, के धागे.

13 अप्रैल 2018

मेरे हिस्‍से धूप कड़ी हो (गीतिका)

छंद- लावणी
शिल्‍प विधान- मात्रा भार-30. 16,14 यति अंत गुरु से
पदांत- मिले
समांत- आँव

मेरे हिस्‍से धूप कड़ी हो, तुझको कोमल छाँव मिले.
मेरे हिस्‍से सख्‍त जमीं हो , तुझको रेशम ठाँव मिले.

मधुबन सी सुरभित हो जीवन, बगिया तेरी हरी-भरी,
कविता गाती मिले कोकिला, क्‍यों कौए की काँव मिले.

ईश्‍वर ने जब रूप दिया है , कोमल फूलों के जैसा,
कोमल पथ ही मिलें न घायल, क्‍यों कोई भी पाँव मिले. 

क्‍यों चाहूँ वह प्रीत ते’री जग, जिसका कोई मोल रखे,
मिले मुझे तू निश्‍छल निष्ठित, नहीं कभी भी दाँव मिले.

प्‍यास बुझे यह नहीं जरूरी, बनी रहे अभिलाषा सी,
मुझको मृगमरीचिका में भी, ‘आकुल’ इक नँदगाँव मिले.