17 जनवरी 2019

शांति से रहो सखे (गीतिका)


छंद- समानिका (वार्णिक)
मापनी- 21 21 21 2
पदांत- सखे
समांत- ओ

शांति  से रहो सखे,
धैर्य से जियो सखे.
 
तर्क से, विवाद से
द्वंद्व से बचो सखे.

बात को खरी खरी,
क्‍यों कभी कहो सखे.

दौड़ भाग कम करो
भीड़ से टलो सखे.

प्रातराश में सदैव
नित्‍य सेब लो सखे,

बाद एक उम्र के,
मोह को तजो सखे.

मित्रता सदैव ही
कामयाब हो सखे

16 जनवरी 2019

कर्म कर आलस्‍य तज तू (गीतिका)


छंद- माधव मालती
मापनी- 2122 2122 2122 2122
पदांत- की
समांत- असी
प्रदत्‍त पद्यांश- ‘कर्म कर आलस्‍य तज’

कर्म कर आलस्‍य तज तू, तोड़ छवि तू आलसी की.
जान कर अनजान मत बन, सीख लेले आरसी की.      

जो न कर पाये भलाई, क्‍यों बुरा है चाहता तू,
जुर्म से रिश्‍ते बनें कम, राह भूलें वापसी की.

गुड़ चना खायें नहीं, परहेज हो यदि, गुलगुलों से,
बात लंघन की हो’ करिए, बात दलिया-लापसी की.

हो नहीं पाता कभी, निष्‍णात बिन, अभ्‍यास कोई, 
है भरोसा लेखनी पर, बात क्‍यों हो जायसी की.

सीख बच्‍चे से मिले या, धर्मगुरुओं से मिली हो,
फर्क मत करना भले, हिंदी नहीं, है फारसी की.

एक समय था (मुक्‍तावली)

1 
एक समय था घर में भी घूँघट लेकर औरत रहती थीं.
कोई भी घर आये, बाहर मिल जाये घूँघट करती थीं.
औरत ने घूँघट त्‍यागा है तब से गिद्ध दृष्टि है उस पर,
इसीलिए पहले घर-घर में दहलीजें चौखट बनती थीं 
2 
एक समय था गाँव-गाँव जीमण पे जाने की थी रीति.
जात-कर्म के मौकों पर ज्योनारों से तुलती थी प्रीति.
चलन वही है ठाठ-बाट भी आज सभी वह ही दिखते,
मात्र उठक बैठक का अंतर है व स्‍वरुचि भोज की नीति
3
नहीं आज की पीढ़ी दोषी, उनका सच सपना कर देखें. 
4
नहीं आज की पीढ़ी दोषी, उनका सच सपना कर देखें. 
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