24 मार्च 2024

सजने लगा है, रंग का, बाजार भी

गीतिका
छंद- मधुवल्लरी (मापनीयुक्त मात्रिक)
मापनी- 2212 2212 2212
पदान्त- भी
समान्त- आर
सजने लगा है, रंग का, बाजार भी।
पिचकारियों की, आज है, भरमार भी।
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रंगोलियाँ, बनने लगीं, दर आँगने,
होने लगे हैं, प्रीत में, मनुहार भी।
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उपवन सभी, लादे हुए हैं, बोर अब
भँवरे कई, करने लगे, गुंजार भी।
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चलने लगे, होली-मिलन के, दौर अब,
हर ओर है, उल्लास, पारावार भी।
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होली नहीं है, बाल-गोपालों बिना,
बच्चों सहित आए सभी, परिवार भी
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अपनी पसंदी, रंग अरु पिचकारियाँ,
झूमें लिए, बच्चे करें, किलकार भी।
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ले के चले, गेहूँ-चने की, बालियाँ,
नमकीन के, सँग में, मिठाई चार भी।
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होली जलेगी, और होगी, जीत फिर,
सौहार्द के सँग सत्य की इस बार भी।
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आओ मनाएँ, रँग लगा, दें इक मिसाल,
त्योहार आते, संग लाते, प्यार भी।
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