17 अगस्त 2022

देर हो पर हो न अंधेर

गीतिका 

आधार छंद- आल्‍ह

खुशी-उदासी, जीवन के क्रम, सरल-कठोर समय का फेर।

डरना कैसा, दुनिया चलती, जीवन-मृत्यु, कभी न टेर।

 

आग भले ही सूरज रखता, ले प्रकाश शीतल है चाँद,

रहे हरी-भरी वसुंधरा, मौसम आते देर-सवेर।

 

कौन चाहता आग लगे पर, जल कर बनता स्वर्ण बिठूर,

भभका करते हैं दावानल, जंगल बनें राख के ढेर।

 

करे संतुलन प्रकृति धरा भी, पहल करे रख मानव धीर,

जन-जल-जंगल बचें जरूरी, बस अब मानव करे न देर।

 

जीवन है अनमोल सखे यह, ‘आकुल का कहना अकसीर,

हो न प्रदूषित हवा कभी भी, देर हो पर हो न अंधेर ।

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